भक्ति या श्रृध्दा सभी धार्मिक परंपराओं का केंद्र बिंदु है। शास्त्रों में भक्ति के अनेक पहलूओं का विवरण दिया गया है और लाखों लोग भक्ति के इन विभिन्न रूपों का अनुसरण करते हैं, पालन करते हैं। एक अच्छा भक्त बनने के लिए, श्रेष्ठतर भक्त बनने के लिए 'भक्ति' शब्द का अर्थ जान लेना बहुत जरूरी है। भक्ति एक संस्कृत शब्द है। अब चूंकि संस्कृत ग्रीक, लैटिन और फारसी जैसी शास्त्रीय भाषा है। इसलिए इसके अधिकांश शब्द जड़ अथवा मूल से व्युत्पन्न होते हैं।
'भक्ति' शब्द मूल रूप से ‘भज’ शब्द से लिया गया है, जिसके कई अर्थ होते हैं यथा - विभाजन, वितरण, आवंटन, विखण्डन या फिर साझा करना, अनुदान देना, प्रस्तुत करना, आपूर्ति करना, प्राप्त करना, भाग लेना, आनंद लेना, संलग्न, मानना, गुजरना, अनुभव, पीछा, अनुसरण, अभ्यास, उगाना, पैदा करना, उपजाना, पसंद करना, घोषित करना, चुनना, सेवाएं देना, सम्मान, प्यार, पूजा, सौदा, पीछा और पकाना। इस प्रकार 'भक्ति' शब्द का अर्थ है - वितरण, विभाजन, अलगाव, सजावट, साझा, पूर्ववृत्ति, लगाव, श्रृध्दा, आस्था, प्रेम, विश्वास, श्रद्धांजलि, पूजा, पवित्रता, प्यार, और आध्यात्मिक ज्ञान अथवा मुक्ति प्राप्त करने का एक साधन, एक रास्ता।
'भक्ति' शब्द का प्रयोग अधिकतर श्रृध्दा और आस्था के विषय में ही किया जाता है। श्रृध्दा जो है वो आस्था और विश्वास की सभी परंपराओं का एक प्रमुख मार्ग है। श्रृध्दा की भावना व्यक्ति के आराध्य, इष्टदेव और भगवान के किसी एक अवतार से जुड़ी हुई होती है। अवतार भी किसी जीवित प्राणी के रूप का, विशेषकर असामान्य मानव की कल्पना से आता है। यह मान लिया जाता है कि भगवान, असामान्य मानवी क्षमताओं के साथ मनुष्य के रूप में अवतरित या प्रकट होते हैं और फिर यही लोगों के आराध्य और इष्टदेव बनते हैं। ऐसे अवतार मानव और ईश्वर दोनों से कहीं परे होते हैं और मनुष्यों की सभी विशेष प्रवृत्तियों, गुणों और आकांक्षाओं का आदर्श स्वरूप स्थापित करते हैं।
भक्ति के अभ्यास और उसके विकास के केंद्र में मुख्य रूप से मानवीय प्रेम और अनुराग की भावना निहित रहती है। भक्ति इस ब्रह्मांड के सभी पहलुओं में दैवत्व को, दिव्यता को एक ठोस आकार देने की प्रक्रिया है। दैवीय सिद्धांतों में जिन चीजों की कल्पना भर की जा सकती है, भक्ति मार्ग से उन सभी कल्पनाओं को संवेदनाओं और आंतरिक अनुभवों के माध्यम से वास्तविकता में बदला जा सकता है। यही भक्ति की शक्ति है। यह प्रतीकात्मक प्रेम करने की प्रक्रिया है जो वास्तव में सभी प्रतीकों से परे है। पूरी तरह से अपने आपको अपने इष्टदेव में खो देना ही भक्ति का परम लक्ष्य होता है और सच्ची भक्ति छोटे से छोटे अहंकार तक को पूरी तरह से नष्ट करके ही की जा सकती है। भक्ति का पालन तीन स्तरों पर किया जाता है - आकांक्षा का चरण, दैवीय मनोदशा का चरण, और अंत में अपने चुने हुए आदर्श के साथ, अपने इष्ट के साथ एकाकार हो जाना।
भक्ति वह अमृत है जो सभी कष्टों, सभी पीड़ाओं को नष्ट करके निरंतर आनंद पैदा करती है। भक्ति, भक्त के अंदर आध्यात्मिक परिपक्वता लाती है और किसी भी प्रकार के अहं से उसे दूर रखती है। आस्था तर्क नहीं ढूंढ़ती। सभी सच्चे विश्वास अंधे हैं। अपने इष्टदेव के प्रति अगाध स्नेह रखना, अगाध प्रीति रखना और उनसे जुड़े सभी नामों के प्रति आस्था बनाए रखना ही भक्ति की पराकाष्ठा है। परम भक्ति की स्थिति में भक्त अन्य सभी इच्छाओं को त्यागकर एकमात्र अपने भगवान के विचार और सार में लीन हो जाना चाहता है। भक्ति के लिए यह आवश्यक है कि भक्त अपने जीवन के हर क्षण में, हर पल में भगवान की, अपने इष्टदेव की श्रेष्ठता और दिव्यता को अनुभव करता चले और उसे स्वीकारे।
भक्ति आध्यात्मिकता को जोड़ती है। भक्ति में यह आवश्यक है कि भक्त की सभी शारीरिक और मानसिक क्रियाएं भगवान की ओर निर्देशित हों। उसे ईश्वर की ओर ले जाएं। भक्त की सभी भावनायें अपने भगवान में ही लीन रहती हैं, और भगवान में लीन होने के कारण ही उसकी सभी भावनाएं उपजती भी हैं। अर्थात् उसके सभी अनुभव भगवान में आत्मसमर्पित होने के अनुभव हैं। उसका प्रत्येक काम, प्रत्येक चेष्टा, ईश्वर की सेवा करने के लिए होती है। पूर्ण समर्पण के साथ भगवान से निष्काम प्रेम का नाम ही भक्ति है।
लेखक : संपादक प्रबुद्ध भारत। यह आलेख लेखक के अंग्रेजी आलेख का हिंदी अनुवाद है |
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यह लेख सर्वप्रथम प्रबुद्ध भारत के July 2017 का अंक में प्रकाशित हुआ था। प्रबुद्ध भारत रामकृष्ण मिशन की एक मासिक पत्रिका है जिसे 1896 में स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित किया गया था। मैं अनेक वर्षों से प्रबुद्ध भारत पढ़ता आ रहा हूं और मैंने इसे प्रबोधकारी पाया है। इसका शुल्क एक वर्ष के लिए रु॰180/-, तीन वर्ष के लिए रु॰ 475/- और बीस वर्ष के लितीन वर्ष के लिए रु॰ 475/- और बीस वर्ष के लिए रु॰ 2100/- है। अधिक जानकारी के लिए