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गढ़वाल में विवाह संस्कार पद्धति, भाग-1

  • यह लेख दो भागों में प्रस्तुत किया जायेगा। इस पहले भाग में पौराणिक ग्रन्थों धर्म/गृह्य सूत्रों में वर्णित संस्कारों की आवश्यकता, विवाह संस्कार का मूल उद्देश्य, विवाह की मूलभावना, विवाह के प्रकार तथा उत्तराखंड-गढ़वाल के ग्रामीण अंचलों में विवाह से पूर्व सम्पन्न किए जाने वाले संस्कारों जैसे; मांगण, वाग्दान, सा-पट्टा, वेदी निर्माण, मांगल गायन, आदि के संबंध में प्रचलित धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताओं तथा ग्रामीण समाज के विशिष्ट रीति रिवाजों पर भी पर्याप्त प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है। 

भूमिका

विवाह एक धार्मिक संस्कार है क्योंकि इसे संपन्न करने के लिए विशेष धार्मिक नियम, उपनियमों के तहत कुछ अनुष्ठान संपन्न करने होते हैं। इस संस्कार मे एक पुरुष और एक स्त्री अपने परिजनों व सर्व समाज के सामने एक साथ रह कर एक परिवार की स्थापना करने की सौगंध लेते हैं और जीवन पर्यंत उसे निभाते हैं। विवाह का प्रमुख उद्देश्य सामाजिक मर्यादाओं का अनुपालन करते हुए संतानोत्पति द्वारा वंश परम्परा को सतत् प्रवाहमान रखना तथा सामाजिक संरचना को अक्षुण्ण रखते हुए श्रृष्टि का निरंतर व सम्यक विस्तार करना है। इसके अतिरिक्त पितृ ऋण, ऋषि ऋण तथा देव ऋण से मुक्ति पाने हेतु भी विवाह एक आवश्यक संस्कार माना गया है, क्योंकि स्मृतियों और धर्म सूत्रों के अनुसार पत्नी के बिना किये गए धार्मिक अनुष्ठान निष्फल माने जाते हैं। भगवान् राम द्वारा सीताजी की अनुपस्थिति में उनकी स्वर्ण प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा करने के पश्चात ही यज्ञानुष्ठान संपन्न हो पाया था।

 

वैदिक ऋषि-मुनियों, आर्य मनीषियों, धर्माचार्यों ने मनुष्य मात्र को पथभृष्ट होने से बचाने तथा एक सुदृढ़ पारिवारिक व सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए धर्मसूत्रों/ गृह्य सूत्रों के माध्यम से मानव के जन्म से मृत्यु पर्यंत अनेक संस्कारों की अवधारणा प्रस्तुत की है। क्योंकि “जन्मना जायते  शूद्र: संस्कारात द्विज उच्यते” उक्ति के अनुसार संस्कार से ही जीव परिष्कृत होता है। गौतम धर्म सूत्र में 30 संस्कार बताये गए हैं। आश्वालायन गृह्यसूत्र में 11, जबकि पारस्कर गृह्यसूत्र में 13 संस्कारों का वर्णन है और गोभिल गृह्यसूत्र 10 संस्कारों की ही चर्चा करता है। परन्तु संस्कार चंद्रिका तथा संस्कार समुच्चय में 16 संस्कारों का प्रणयन किया गया है। इन सभी ग्रंथों में विवाह संस्कार को संपन्न करना परम आवश्यक माना गया है क्योंकि विवाह के पश्चात ही एक स्वस्थ्य पारिवारक इकाई का निर्माण होता है और बाकी समस्त संस्कार इस इकाई द्वारा ही संपन्न किये जाते हैं। गढ़वाल में 16 संस्कारों की अवधारणा ही प्रचलित है।

KALASH 

 

                                                                                             पौराणिक आख्यानों से सिद्ध होता है कि धर्म/गृहयसूत्रों में वर्णित सर्वमान्य “विवाह” संस्कार पहले पहल उत्तराखंड(गढ़वाल) की धरती पर ही सम्पन्न हुआ था, जब वैदिक रुद्र (भगवान शिव) ने हिमालय की इसी उपत्यका में हेमंत ऋषि/हिमवान व मैनावती की पुत्री काली-पार्वती (शिव पुराण में पार्वती का मूल नाम काली बताया गया है जो पर्वतराज की पुत्री होने से पार्वती कही गईं) से केदार क्षेत्र के त्रिजुगी नारायण स्थल पर विधिवत विवाह रचा कर वैवाहिक संस्था का सूत्रपात किया था। उस अलौलिक विवाह की साक्षी, पवित्र अग्नि अनंतकाल से आज तक प्रज्वलित है। द्वापर युग में, श्रीकृष्ण पौत्र अनिरुद्ध एवं बाणासुर पुत्री उषा का विवाह भी यहाँ उखीमठ स्थल पर सम्पन्न हुआ था।

उत्तराखंड के छः पूर्वी जिले कुमाऊँ मण्डल तथा पौड़ी, रुद्रप्रयाग, चमोली, टिहरी, उत्तरकाशी, पाँच पहाड़ी जिले व देहरादून और हरिद्वार दो मैदानी जिले मिल कर गढ़वाल कहलाते हैं। देहरादून का पश्चिमी पर्वतीय भाग जौनसार-बावर कहलाता है। भू-वैकुंठ श्री बद्रीनाथ धाम, ज्योतिर्लिंग केदारनाथ, गंगोत्री और जमुनोत्री विश्व प्रसिद्ध चार धाम भी इसी भूमि पर स्थित है। गढ़वाल में विवाह पूर्णतः धार्मिक संस्कार माना जाता है। मान्यता है की विवाह ईश्वर द्वारा सुनिश्चित किया गया एक पवित्र बंधन है, स्त्री पुरुष की जोड़ी स्वर्ग में रची जाती है और धरती पर एकाकार होती है। 

विवाह की आयु

गढ़वाल में विवाह की कोई आयु निर्धारित नहीं है। बच्चों के पूर्ण यौवन प्राप्त कर लेने, आजीविका चलाने में सक्षम हो जाने और परिवार संभालने लायक हो जाने पर विवाह कर दिए जाते हैं। परन्तु आज से 6-7 दशक पूर्व तक रजस्वला होने से पहले ही कन्या का विवाह कर देने की प्रथा थी जो पौराणिक/धर्म-गृह्य सूत्र युग की देन मानी जाती है। ( वैदिक आश्रम व्यवस्था के अंतर्गत 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य व्रत पालन करने का विधान था ) इन मान्यताओं के अनुसार विवाह की आयु कन्या के लिए 12 वर्ष से पूर्व तथा वर हेतु 14-18 वर्ष मान्य थी। कम आयु में विवाह के अनेक सामजिक, आर्थिक, निहितार्थ भी थे। किन्तु पूरे देश में हो रहे सामाजिक परिवर्तनों, शिक्षा व स्वास्थय सेवाओं के विस्तार, आजीविका के बढ़ते अवसरों तथा महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों के प्रसार के कारण अब कम आयु में विवाह की प्रथा समाप्त हो गई है।

 Granthi Bandhan

गढ़वाल में विवाह प्रथाएं

वेदों, स्मृतियों, पुराणों, धर्म/गृहयसूत्रों में देव, ब्राह्म, आर्य, प्राजापत्य, असुर, गान्धर्व, राक्षस, पैशाच आठ प्रकार के विवाह बतलाये गए है। इनमें प्रथम चार प्रकार सामाजिक रूप से ग्राह्य माने गए हैं। गढ़वाल में ब्राह्म विवाह हि मुख्यतः प्रचलित हैं, जिसमें माता-पिता कन्या/वर के अनुरूप उपयुक्त वर/कन्या ढूंढ कर कन्या को आभूषण, वस्त्रादि देकर समाज के सम्मुख वर के साथ परिणय सूत्र में बाँध देते है। पूर्व काल में यहाँ सीमांत क्षेत्रों के धनहीन परिवारों में असुर विवाह भी प्रचलित रहे हैं जिसके अंतर्गत साधन सम्पन्न परिवार धनहीन परिवार की कन्या से पारस्परिक सहमति के आधार पर कुछ प्रतिकर देकर विवाह सम्पन्न कर लेते थे। ऐसे विवाहों में, वैवाहिक संस्कार चुपचाप ओबरा (दोमंजिले मकान का नीचे वाला कक्ष) में सम्पन्न किए जाते थे। परंतु वर्तमान में कुछ पिछड़ी जातियों में छुट-पुट घटनाओं के अतिरिक्त यह प्रथा समाप्त हो गई है।

 

आर्थिक रूप से संपन्न व अच्छी जमीन जायदाद वाले परिवारों में बहु-पत्नी प्रथा भी प्रचलित थी। मुख्यतः पूर्व पत्नी की पुत्र संतान न होने या खेती-किसानी हेतु जनशक्ति बढाने के लिए सक्षम पुरुष 2-3 या अधिक विवाह करते थे। कुछ इलाकों, जैसे जौनसार-बावर क्षेत्र, में बहु-पति विवाह भी प्रचलित थे। जनश्रुति के अनुसार ये लोग स्वयं को पांडवों का वंशज मानते थे और इनमें पांडवों की ही तरह बहुपति विवाह मान्य थे। किन्तु शिक्षा के प्रसार और स्वास्थ जागरूकता के चलते अब यह प्रथा भी लगभग समाप्तप्राय हो चली है।

 

वर्तमान समय में शहरी क्षेत्रों में तो पूरे देश में प्रचलित आधुनिक विवाह पद्धति ही गढ़वाली परिवारों में भी प्रचलित है किन्तु ग्रामीण समाज की अपनी विशिष्ट परम्पराएँ आज भी जीवंत हैं। इस लेख में हम उन्हीं परम्पराओं पर चर्चा करेंगे गढ़वाल में विवाह, पारिवारिक प्रतिष्ठा के अनुरूप एवं सामान वर्ण के अंतर्गत ही संपन्न किये जाते हैं। वर- वधु के खानदान, संस्कार, गोत्र व प्रवर को महत्व दिया जाता है। आर्थिक स्थिति द्वितीयक मानी जाती है। इस प्रकार यहाँ भारद्वाज गृह्य सूत्र (1/11) का अनुसरण होता है जिसके अनुसार कन्या चयन में धन, सौन्दर्य, बुद्धि व कुल चार गुण देखे जाने चाहियें, किन्तु यदि ये चारों गुण न मिलें तो बुद्धि और कुल को महत्व दिया जाना चाहिए। 

 

गढ़वाल में विवाह का मुख्य सूत्र परिवार के पुरोहित के हाथ होता है, जिनके यजमानी क्षेत्र के अनेक गांवों में फैली हुई होती है। ग्रामीण जन अपने पुरोहितों पर समस्त धार्मिक कृत्यों, जीवन के 16 संस्कारों को संपन्न करने के लिए पूर्णतः आश्रित रहते हैं और पुरोहित भी यजमानों के हित साधन का यथासंभव प्रयास करते हैं।

 DOLI

मांगण (मंगनी)

यह गढ़वाली विवाह पद्दति का प्रथम चरण है विवाह योग्य युवाओं के अभिभावकों द्वारा पुत्र/पुत्री के विवाह के लिए उपयुक्त जोड़ी की तलाश हेतु आग्रह करने पर पुरोहितजी विभिन्न परिवारों के गोत्र, प्रवर, आर्थिक स्थिति, संपत्ति आदि के अनुसार कुछ प्रस्ताव परिवार के समक्ष रखते हैं। उन प्रस्तावों में से कोई प्रस्ताव पसंद आने पर लड़के के माता-पिता के आग्रह पर पुरोहित जी कन्या की जन्मपत्री मांग कर दोनों की कुंडली का मिलान करते हैं।

 

जन्म पत्री का मिलान हो जाने के बाद दोनों परिवारों की सहमती पर पुरोहित जी को कन्या  के घर प्रस्ताव लेकर भेजा जाता है। पुरोहितजी वहां जाकर लड़की के परिवार से युवक हेतु लड़की मांग लेते है। इस रस्म को मांगण (मंगनी) कहते हैं। लड़की के परिवार द्वारा पुरोहितजी की मांग स्वीकार कर लेने पर पुरोहितजी लड़की का टीका कर देते हैं और लड़की वाले लड़के के लिए टीका-पिठाईं दे देते हैं। यह रस्म दोनों परिवारों के सम्बन्ध की पुष्टि मानी जाती है। अब पुरोहित जी दोनों परिवारों से वार्ता करके वर-वधु की कुंडली के गृह-गोचर के आधार पर बाग्दान/सगाई व विवाह का दिन निश्चित करते है।

 

बाग्दान (सगाई)

आपसी सहमती से बाग्दान की तिथि तय हो जाने पर लड़के के पिता, लड़के के मामा सहित 5-7 सम्बन्धियों व पुरोहितजी के साथ कन्या के घर पिठैं (टीका) लेकर जाते हैं। टीके में रोली, हल्दी, अक्षत, कन्या के लिए एक-दो जोड़ी वस्त्र, अंगूठी और सामर्थ्यानुसार कोई अन्य आभूषण, हरा शाक, फल व् मिठाई होते हैं। कन्या के घर पर कन्या पक्ष के पुरोहित   गणेश-अम्बिका सहित पंचदेव पूजनोपरान्त इंद्राणी (न्याय की देवी) की पूजा-प्रतिष्ठा संपन्न करते हैं। कन्या को वर के परिवार द्वारा लाए गए वस्त्र व आभूषण पहना कर लक्ष्मी स्वरूप मानते हुए कन्या-पूजन करते हैं और कन्या का पिता वर के पिता के समक्ष इंद्राणी को साक्षी मान कर संकल्प छोड़ता है की आज मैं अपनी कन्या आपके पुत्र के लिए देता हूँ। वर का पिता कन्या को पुत्री के रूप में स्वीकार करने का संकल्प छोड़ता है।

 

इस रस्म को बाग्दान, (वाक्य/वचन का दान) कहा जाता है। शहरों में यही रस्म सगाई कहलाती है। कन्या का पिता एक पीतल की परात, चावल से भरा ताम्र कलश अथवा ताम्बे की गागर (पानी रखने के लिये छोटे मुंह का एक बर्तन), वर के लिए वस्त्र, अंगूठी, फल, मिठाई, उरद की पकोड़ी (विशेष शुभ मानी जाती है) और तिलक(दक्षिणा) भेंट करते हैं तथा आगंतुक मेहमानों का आदर सत्कार करते हुए भोजनादि के पश्चात दक्षिणा देकर विदा करते हैं।हालांकि अब वर-कन्या के फोटो देखने दिखाने या व्हाट्स एप पर चैटिंग का चलन भी चल पड़ा है। शहरों में लड़का भी सगाई में शामिल होता है।

सा-पट्टा (शाह पट्टा) 

सा-पट्टा, वर पक्ष के पुरोहित द्वारा तैयार की गई एक लिखत होती है, जिसमें श्री गणेशाय नमः से आरम्भ करके वैवाहिक कार्यक्रम जैसे; स्तम्भ पूजन, विवाह लग्न, फेरे / सप्तपदी, गाय/शय्या दान, विदाई आदि का समय, बारातियों की संख्या आदि का विस्तृत व्योरा अंकित होता है, जिसे विवाह से पूर्व अनुष्ठान पूर्वक कन्या के घर भेजा जाता है। यदि विवाह की तिथि दूर हो तो सा-पट्टा वैवाहिक तिथि से एक माह पूर्व किन्तु यदि तिथि निकट हो तो 7,5 या 3 दिन पहले भेजा जाता है। इस पट्टे को लेकर पुरोहित जी, लड़के के भाई, मामा, चाचा/ ताऊ आदि  5 या 7 पारिवारिक जन लड़की के घर जाते हैं।

 

पुरोहित जी के पास शुभ-शकुन सूचक, दही से भरी एक परोठी (लोटे के आकार का एक काष्ठ पात्र) होती है जिसके मुंह पर पीला वस्त्र मौली से बाँध दिया जाता है इस वस्त्र पर उरद की दाल की 5-7 पकोडियाँ भी बाँधी जाती हैं। साथ में हरा साग जैसे पालक(शुभता/प्रकृति का प्रतीक), मिठाई आदि भी ले जाते हैं। लड़की वाले इस परोठी में चावल भर कर लड़के वालों को दक्षिणा सहित वापस कर देते हैं। लड़की वाले आगंतुकों का सत्कार करते हुए विवाह सम्बन्धी आवश्यक विचार विमर्श के पश्चात भोजनादि के बाद टीका करके उन्हें विदा करते हैं। वर्तमान समय में शहरी क्षेत्रों में कार्य व्यापार, पारिवारिक व्यस्तताओं के चलते बरात के वधु गृह पहुँचने से कुछ देर पहले सा-पट्टा भेज कर रस्म पूरी कर दी जाती है।

 PAALKI

वैवाहिक तैयारी    

विवाह की तिथि से एक सप्ताह पूर्व मांगलिक रस्में आरम्भ हो जाती हैं। सारे गाँव की महिलायें वर/ वधु के घर पर एकत्र होकर गेंहू, दाल, चावल, मसाले आदि से कंकर आदि बीन कर साफ़ करती है। विवाह से एक दिन पहले गाँव में सामूहिक भोज का आयोजन होता है। इसके लिए सुबह के समय कोई पुरुष, धै (आवाज) देकर गाँव की सभी महिलाओं को वर/वधु के घर पर बुलाता है। जैसे “दाल पिसणू आवा हो ”(दाल पीसने के लिए आओ) इसी प्रकार आटा गूंधने, पकोड़े बनाने. पूरी/रोटी बेलने आदि के लिए गाँव की स्त्रियों को बुलाया जाता है। इसके साथ ही गाँव के औजी (ढोली) को भी मंगल वाद्य बजाने, मंगल गायन व कुलाचार के लिए आमंत्रित किया जाता है। परिवार की कुलवधुएँ, गाँव की बुजुर्ग स्त्रियाँ और औजियों की वधुएँ, माँगल गाने के लिए आमंत्रित की जाती हैं। इन्हें मंगलेनी कहा जाता है।

 

मांगल वर व वधू दोनों के घर पर अग्नि प्रज्वलित करते, भोजन बनाते,हल्दीहाथ,,वेदी निर्माण, मंगलस्नान, वस्त्राभरण  धारण कराने, स्तम्भपूजन, बारात स्वागत, धूलिअर्घ्य, बारातियों को जिमाते, कन्यादान, फेरे, विदाई, वधु गृह प्रवेश, आदि सभी अवसरों पर गाये जाते हैं। परंतु क्योंकि विवाह की ज़्यादातर रस्में कन्यागृह पर ही सम्पन्न होती है, अतः मांगल गायन कन्यागृह पर विशेष महत्व रखता है। सबसे पहले देवताओं का स्मरण किया जाता है। यहाँ के समस्त मांगल गीत वैदिक ऋचाओं/मंत्रों से अभिप्रेरित हैं। स्वस्तिवाचन का अद्भुत साम्य इन गीतों मे दिखाई देता है। उदाहरणार्थ, “रूपं देहि, जयं देहि, यशो देहि द्विषोजही” की स्पष्ट झलक निम्नांकित माँगल में देखि जा सकती है।

MAANGALGAAYAN

जौ जस देई धरति माता, जौ जस देई कूरम देवता …..। जौ जस देई भूमि का भूम्याल, जौ जस देई इष्ट-कुल देवा……। जौ जस देई खोली का गणेश, जौ जस देई मोरी का नारैण ...।  जौ जस देई पंचनाम देवा, जौ जस देई पितर देवता....।  

यहाँ भूमि, भूमि के रक्षक देव भूमिपाल, द्वार के रक्षक गणेश, झरोखे के रक्षक नारायण, पन्चनाम देवताओं, इष्ट-कुल देवता, पितृ देवताओं के साथ-साथ समस्त भूमंडल के देवताओं से शुभ कार्य में जय, यश व सफलता की कामना की जाती है। इसके बाद कव्वे (पित्रों का संदेशवाहक माना जाता है) को बुला कर उससे चारों दिशाओं में शगुन सूचना देने का आग्रह किया जाता है। इस सहयोग के लिए उसकी चोंच को सोने से मढ़वाने तथा पंखों पर चांदी के पत्र चढ़ाने का प्रलोभन भी दिया जाता है।

बैठो कागा बैठो कागा हरिया बिरीछ, बोलो कागा बोलो कागा चौदिसी सगून...। 

सोना कि तेरी मि चोंच गढ़ौलों, चाँदी का तेरा मि पंख मढ़ौलों….। बोलो कागा....,

अब शगुन सूचक, तोते से आग्रह किया जाता है की वो जाकर , देवी सावित्री , लक्ष्मी, पार्वती, सीता और अनेक सुहागिन नारियों को शगुन (माँगल) गाने तथा हमारे इस मंगल कार्य में शामिल होने के लिए न्यौता दे आये।

पिंजरी का सूआ, अटारी का सूआ, जा सूआ दी आऊ स्वागेंण्यूँ न्यूतो....…।

सूनपंखी सूआ तू, लाल ठूंठी सूआ, जा सूआ दी आऊ स्वागेंण्यूँ न्यूतो..... ।

ब्रह्मा घर होली सावित्री स्वागेण, बिसनु घर होली लछमी स्वागेण, 

इसी तरह देवी पार्वती, सीताजी और सभी सुहागिनों को आमंत्रण दिया जाता है।

इसके बाद गाँव के सभी जाति धर्म के लोगों को न्योता दिया जाता है , आखिर विवाहोत्सव की खुशी से किसी को भी वंचित नहीं किया जाना चाहिए और फिर इस महत्कार्य मे सभी का योगदान भी तो अपेक्षित है। अतः औजी-बाजगी, पानी लाने वाले झीवर, टोकरी बुनने वाले रूडिया, बढई, लोहार,गाय, बैल, यहाँ तक कि हल्दी की क्यारियों, मोती(चावल) उपजाने वाले धान के खेतों और दोने, पत्तल, बनाने के लिए मालु के पत्तों को भी निमंत्रण दिया जाता है जो प्रकृति की शक्तियों के स्तवन का प्रतीक है। इन गीतों में वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।

पैलो न्यूतो पैलो न्यूतो बेद मुखी बरमा,  आज चैन्द बरमा को काज- 2

दूजो न्यूतो दूजो न्यूतो, औजी को बेटा,   आज चैन्द बधैई को  काज - 2

आज न्यूती याने मैंन    स्वागेण नारी,  आज चैन्द सगुन को  काज- 2

आज न्यूती याने मैंन हल्दानूँ की बाड़ी,  आज चैन्द हलदी को  काज- 2 

आज न्यूती याने मैंन सट्यूँ  की सटेड़ी,  आज चैन्द मोsत्यों को काज- 2.

 

इसके साथ ही भोजन के लिए पत्तल व दोने बनाने के लिए युवकों व पुरुषों को बुलाया जाता है। युवक जंगल से मालू के पत्ते लेकर आते हैं। कुछ बुजुर्ग बांस के डंडे छील कर छोटी-छोटी तीलियाँ बनाते हैं जिन्हें सिणकी/सेणकी कहते हैं। इन तीलियों से पत्ते जोड़ कर पत्तल व दोने बनाये जाते हैं। आजकल सक्षम लोग रेडीमेड दोने-पत्तल मंगाने लगे है।(कहीं-कहीं पंचायतों/महिला मंगल दलों/स्वयं सहायता समूहों ने थाली, गिलास व् अन्य आवश्यक बरतन मंगा कर रखे हैं जिन्हें अत्यंत अल्प शुल्क पर उपलब्ध करा दिया जाता हैं) परन्तु भोजन पकाने के लिए सरोला ब्राह्मण को ही बुलाया जाता है क्योंकि कच्चा खाना, यानी दाल-चावल, सब्जी, मीठा भात आदि जो, गढ़वालियों का परंपरागत भोजन है केवल सरोला ब्राह्मणों के हाथ से बना हुआ ही खाया जाता है। हाँ पक्का खाना, अन्य ब्राह्मण/ क्षत्रिय रसोइये के हाथ से बना हुआ भी खाया जा सकता है।

 

( गढ़वाल में ब्राह्मणों के श्रेष्ठता क्रम में तीन वर्ग हैं । प्रथम श्रेणी के सरोला- बाह्यागंतुक ब्राह्मण जो रियासत काल मे राजसत्ता / ठकुराइयों के पुरोहित या कृपापात्र रहे। द्वितीय श्रेणी के गंगाडी ब्राह्मण-जो पहाड़ों की नदी घाटियों में निवसित हैं और तीसरे नानागोत्री-जो स्थानीय खश ब्राह्मण व सरोला या गंगाडी ब्राह्मणों के मेल से जन्में ब्राह्मण है)

 

भोजन तैयार हो जाने पर पुनः गाँव वालों को खाना खाने के लिए पुकारा जाता है। जो लोग आने में असमर्थ होते हैं उनके घर परोसा (भोजन- मिष्ठान, शुभता के प्रतीक उरद की दाल के पकोड़े व स्वाला- दूध और पानी से आटा गूंध कर बनाई गई छोटी-छोटी मुलायम पूरियां) भेजा जाता है।  कन्या के घर पर रोट (दूध व घी का मोयन मिला कर गुड़ के पानी से आटा गूंध कर लकड़ी के सांचों के बीच में आटे की लोई को दबाकर तेल में तल कर तैयार किया गया पकवान) व अरसा (भीगे हुए चावलों के आटे को गुड के पानी में गूंथ कर उसकी लोइयां हाथों से दबा कर तेल में तल कर तैयार किया गया पकवान) भी पकाए जाते हैं। ये अरसे और रोट लड़की की विदाई पर कल्यो-कंडी/ दूण-कंडी (एक द्रोण) के नाम से रिंगाल (बेंत) की कंडी में भर कर लड़की की ससुराल भेजे जाते हैं जहां ये पैणा (किसी शुभ कार्य के सम्पन्न होने पर पूरे गाँव में बांटे जाने वाला मिष्ठान्न/पकवान या गुड़) के नाम से पूरे गाँव में बांटे जाते हैं।

 

पहले कन्या पक्ष द्वारा, दहेज के रूप में दूण-दैजो (1-2 द्रोंण चावल) और घरेलू इस्तेमाल के बर्तनों के साथ-साथ पीतल, ताम्बे व कांसे के बड़े-बड़े बर्तन (भड्डू, डेगची, परात, गेडू, गागर, बंठा) भी दिए जाते थे। परन्तु शनै: शनै; ये प्रथाएं कम होती जा रही है। यहाँ गाँव के किसी भी परिवार की बेटी सारे गाँव की बेटी मानी जाती है और इसी भावना के साथ गाँव के सभी परिवार विवाह वाले परिवार को यथासंभव घी, दूध दही, धान्य, दाल, सब्जी आदि उपलब्ध करा कर मदद करते हैं। सक्षम लोग वर-वधू के लिए भेंट में पांच बर्तन (लोटा, थाली, गिलास, कटोरी, चम्मच) अथवा लोटा थाली और न्योते में कुछ रुपये देकर सहयोग करते हैं। यही सामूहिकता की भावना गढ़वाल के गांवों का प्राण है।

 

वेदी का निर्माण

लड़की के घर पर विवाह हेतु मिटटी-पत्थर से चौकोर वेदी बनाई जाती है। पंडित विष्णु भट्ट जी के अनुसार वेदी की प्रत्येक भुजा कन्या के हाथ के माप से सवा चार हाथ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थ की प्रतीक) और ऊंचाई सवा हाथ रखी जाती है। वेदी के एक कोने पर केले का फलदार वृक्ष तथा बाकी तीन कोनों पर चीढ़, पद्म, आम्र,देवदारु की शाखे स्थापित की जाती हैं जिन्हें स्तम्भ कहा जाता है। इन स्तंभों पर ईशान से आरंभ करके क्रमश: ब्रह्मा, विष्णु,रुद्र और इन्द्र, चार मुख्य देवों के साथ चारों वेदों की भी स्थापना की जाती है।

 

इनके अतिरिक्त वेदी के चारों ओर सवा दो फुट की दूरी पर ईशान दिशा से आरंभ करके घड़ी की सुइयों की दिशा में, चीड़/देवदारु, आम्र पल्लव युक्त मिट्टी के जल कलशों पर सूर्य, गणपती, अनंत, स्कन्द, यम, वायु, सोम, वरुण, वसु, कुबेर, बृहस्पति व विश्वकर्मा इन 12 देव स्तंभों की भी स्थापना की जाती है। इस प्रकार विवाह वेदिका पर कुल 16 स्तम्भ स्थापित किए जाते है। वेदी और इन 12 स्तंभों के मध्य की परिधि में ही फेरे(भांवरें) डाले जाते हैं। वेदी के ऊपर चंदोया (पीले रंग की एक चादर जिसके बीच में चावल, हल्दी की गाँठ, सुपारी, राइ के दाने बंधे रहते हैं) चढ़ाया जाता है। मंडप में पूजन सामग्री, दीपक, सूप, हवनकुंड, लाजाखील, जल कलश आदि वस्तुएं प्रयुक्त होती है। परिक्रमा पथ के उत्तरी भाग में सिलबट्टा रखा जाता है। वेदी निर्माण संबंधी पिता-पुत्री का संवाद मांगलगीतो में स्फुरित होता है:

के केन बाबाजी, के केन बाबाजी बेदी चिणैल्या, के केन बाबाजी स्तम्भ घैटील्या ए..........

के केन बाबाजी, के केन बाबाजी चौक  पुरैल्या, के केन बाबाजी सुतर  सरैल्या  ए...........

सोना-चांदी न मैं, सोना-चांदि न मैं बेदी चिणौलो, रतन-फटिंग का स्तम्भ घेंटौलो ए..........

या होलि बाबाजी या होलि बाबाजी स्वर्ग की रीत, तुम छाया बाबाजी धरती का वासी ए....

धरती की बिधि न वेदी बणावा -2 ए...............                                                         

माटा ढूंगौन, माटा ढूंगौन मी बेदी चिणौलों, केला कुलें का मी स्तम्भ घैंटौलो ए.........

जी रैनी बाबाजीs, जी रैनी बाबाजीs, लाख बरीस, या बिधि तुमन खूब बताये ए...............

कन्या अपने पिता से पूछती है की आप किस वस्तु से वेदी बनायेंगे, किस वस्तु से वेदी के स्तम्भ बनायेंगे, किस वस्तु का आसन बिछायेंगे और किस चीज से आँगन पूरेंगे। उत्तर में पिता अपनी समस्त संपत्ति न्यौछावर कर देना चाहते हैं और कहते हैं कि मैं सोने-चांदी से वेदी बनाउंगा, रत्न- स्फटिक के स्तम्भ स्थापित करूंगा, सोने का छत्र चढ़ाऊंगा, केसर कुमकुम से वेदी ढक दूंगा और गज मुक्ताओं से चौक पुराउंगा। पुत्री अपने पिता की आर्थिक स्थिति जानती है अतः पुत्री कहती है कि पिताजी यह तो देव लोक की विधि है जबकि आप पृथ्वी वासी हैं अतः पृथ्वी की रीति के अनुसार वेदी बनाने का उपक्रम करें।

इस पर पिता पुत्री की भावना समझ कर आँखों में ख़ुशी के आंसू भर कर कहते हैं, प्रिय पुत्री मैं मिट्टी-पत्थरों से चौकोर वेदी बनाउंगा, केले, चीड़, पद्म, आम्र वृक्षों के स्तम्भ स्थापित करूंगा, कमेड़ा (एक प्रकार की चिकनी मिटटी) से वेदी की लिपाई करूंगा, जौ और तिल से चौक पुराऊंगा और कुमकुम केसर से वेदी को सजाऊंगा। पुत्री अश्रुपूरित आँखें उठाकर कहती है पिताजी आप लाख बरस जियें आपने बहुत अच्छी विधि सुझाई है। पिता-पुत्री का यह संवाद इतना मार्मिक है की सभी उपस्थित लोगों की आँखें अनायास ही भर आती हैं।

भाग 2 - अब इस द्वितीय भाग में विवाह के मुख्य संस्कार हल्दीहाथ से लेकर वधू गृह प्रवेश तक की प्रविधियों का सविस्तार वर्णन किया जा रहा है। To read गढ़वाल में विवाह संस्कार पद्धति भाग-2

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