ध्यान क्या है?

ध्यान एक सामान्य रूप से प्रयोग किया जाने वाला संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है-एकाग्रचित्त हो जाना। आजकल भगवान को मानने वाले और उन्हें न मानने वाले दोनों ही प्रकार के लोगो में इसका चलन और महत्व बढ़ता जा रहा है। इसलिए इस शब्द का उचित अर्थ समझ लेना बहुत आवश्यक है। सबसे पहली बात तो यही कि यह संस्कृत का शब्द है। जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है। अब चूंकि संस्कृत अपने आप में विश्व की अन्य पुरानी भाषाओं- ग्रीक, लैटिन और फारसी आदि जैसी शास्त्रीय भाषा है। इसलिए अन्य शास्त्रीय भाषाओं की तरह संस्कृत के भी अधिकतर शब्द मूल अथवा जड़ से व्युत्पन्न होते हैं।

'ध्यान' शब्द मुख्यरूप से दो शब्दों ‘धि’ और ‘यान’ से मिलकर बना है। ‘धि’ के अर्थ होते हैं - चिंतन, मनन, वरदान या इच्छा। और ‘यान’ के अर्थ होते हैं- रास्ता, यात्रा, कारवां, गमन, सवारी, गाड़ी, वाहन या जहाज। यानी कि ‘धि’ और ‘यान’ इन दोनों शब्दों से मिलकर बने ‘ध्यान’ शब्द का अर्थ हुआ- सम्यक चिंतन का एक रास्ता, तरीका या माध्यम। 'ध्यान' शब्द को एक अन्य शब्द ‘ध्वनि’ द्वारा भी व्युत्पन्न किया जा सकता है। जिसका अर्थ होता है- सोचना, विचारना, कल्पना करना, एकाग्रचित्त होना, मस्तिष्क की पुकार और झुकाव। इस प्रकार से 'ध्यान' शब्द का अर्थ हुआ- एकाग्रचित्त होकर किसी एक चीज पर ध्यान केन्द्रित करना।

 

ध्यान पतंजलि के अष्टांग योग का सातवां चरण है। यह चरण शरीर के आठ अंगों के योगाभ्यास का आखिरी चरण है, जो समाधि से ठीक पहले आता है। ध्यान अपने आप में बहुत गहरा शब्द है और एकाग्रता से भी कहीं अधिक गहरा और अर्थपूर्ण।

 

जो व्यक्ति ध्यान लगाना चाहता है उसे ध्यान लगाने से पहले अन्य छैः चरणों- यम( सामाजिक नैतिकता), नियम (व्यक्तिगत नैतिकता), आसन (शारीरिक योग), प्राणायाम (सासों का नियंत्रण), प्रत्याहार (इंद्रियों का नियंत्रण) और धारणा अर्थात् निरंतर एकाग्रता का अभ्यास करना होता है।

 

जहां यम का अर्थ होता है हिंसा, झूठ, चोरी, कामुकता और संग्रह से दूर रहना। वहीं, नियम का अर्थ है- शुध्दता, संतुष्टि, तपस्या, शास्त्रों का अध्ययन, और एक उच्च सिद्धांत के लिए आत्मसमर्पण करना। 'आसन' अर्थात् शरीर की विभिन्न मुद्राएं बनाना और 'प्राणायामका अर्थ है- सांसों पर नियंत्रण। यहां धारणा, एकाग्रता की ओर इंगित करता है। दूसरे शब्दों में कहें तो मस्तिष्क के सभी विचारों को किसी एक ही वस्तु अथवा बिंदु पर केंद्रित करने का नाम है- धारणा।

 

धारणा का अभ्यास करना साधारण रूप से इतना सतत् या निरंतर नहीं होता है। इसमें रुकावटें होती हैं। जब धारणा के लगातार अभ्यास से मन आसानी से एकाग्रचित्त होकर किसी वस्तु पर केंद्रित होने लग जाता है, एकदम सतत्, धाराप्रवाह, बिल्कुल उसी प्रकार जिस प्रकार से तेल एक बर्तन से दूसरे बर्तन में उड़ेला जाता है, तब यह ध्यान में परिवर्तित हो जाता है। योग दर्शन में  ध्यान, एकाग्रता को नही समझा जाता बल्कि यह मन की शांति के रूप में जाना जाता है। इस प्रकार की मन की शांति ऊपर बताई गई छैः क्रियाओं का अभ्यास करने से पाई जा सकती है। अंत में यही कहना पर्याप्त होगा कि ध्यान वास्तव में एक ऐसी मनःस्थिति को कहते हैं, जब मस्तिष्क में केवल एक ही विचार हो।

 

ध्यान का उद्देश्य मस्तिष्क को सभी संस्कारों और गुप्त प्रवृत्तियों से मुक्त करना होता है। इसके अभ्यास से व्यक्ति का ध्यान अन्य सभी वस्तुओं से हटकर मात्र एक लक्ष्य पर केन्द्रित हो जाता है। गहरे ध्यान की स्थिति में व्यक्ति लक्षित वस्तु और स्वयं को एकाकार पाता है। उस समय उसे मात्र आत्मज्ञान रह जाता है। ध्यान की तुलना मन की स्थिरता के साथ भी की जा सकती है। बिल्कुल एक पानी की झील की तरह शांत और स्थिर। ध्यान में केवल आत्मज्ञान रह जाता है बाकी सब इसी स्थिति में लुप्त हो जाता है।

 

लेखक : संपादक प्रबुद्ध भारत - यह आलेख लेखक के अंग्रेजी आलेख का हिंदी अनुवाद है |

 

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यह लेख सर्वप्रथम प्रबुद्ध भारत के November 2017 का अंक में प्रकाशित हुआ था। प्रबुद्ध भारत रामकृष्ण मिशन की एक मासिक पत्रिका है जिसे 1896 में स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित किया गया था। मैं अनेक वर्षों से प्रबुद्ध भारत पढ़ता आ रहा हूं और मैंने इसे प्रबोधकारी पाया है। इसका शुल्क एक वर्ष के लिए रु॰180/-, तीन वर्ष के लिए रु॰ 475/- और बीस वर्ष के लितीन वर्ष के लिए रु॰ 475/- और बीस वर्ष के लिए रु॰ 2100/- है। अधिक जानकारी के लिए

 

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