HADI RANI - Her story and Dance drama

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  • This article gives the full story of the legendary queen with lyrics. It also has U Tube links to a dance-drama by Pallavi Raisurana. The commentary is by Commander Mehta.

This is a highly inspirational, emotional and power-packed dance-drama presented for the first time for public viewing. I am talking about HADI RANI, a legendary character and a daughter of Hada Rajput, married to Chundawat Chieftain of Salumbar, in Mewar, (Rajasthan, India) sacrificed herself to motivate her husband to go to the War.

Maharana Raj Singh I (1653–1680) of Mewar called upon Salumbar Rawat, her husband, to join the battle against Aurangzeb. The Chieftain, having married only a night before hesitated about going into battle. Rajput honour being what it is, the newly wed bride inspired him to join the battle regardless of his reservations. On the way to battlefield, the Rawat sent his trusted man to his wife Hadi Rani and ask for some memento to which he could take with him to the battle.

Thinking that she was an obstacle to her husband performing his duty for Mewar, she cut off her head and put it on a plate in her dying moments. A faithful servant covered it with a cloth and presented it to her husband. The Chieftain devastated but nevertheless proud, tied the memento around his neck by its hair. He fought bravely, making the Aurangzeb forces flee, and after his victory he got to his knees and cut his neck, having lost the desire to live.

To read the article with lyrics in PDF.

Hadi Rani, Salumbar Palace, Mewar, Rajasthan.

These verses written by Rajasthan Rajya Kavi, Madhav Darak and composed by Siddharth Kasyap is presented in an abridged version, in a dance-drama form, presented by Kathak exponent Pallavi Raisurana. The song is sung by Raja Hasan and Jankee Parekh Mehta.

To see 9 minute video Hadi Rani – Dance-drama by Pallavi Raisurana

मैं एक ऐसी रानी का जिक्र कर रहा हूँ, जिसने युद्ध में जाते अपने पति को निशानी मांगने पर अपना सिर काट कर भिजवा दिया था | यह रानी बूंदी के हाडा शासक की बेटी थी और उदयपुर (मेवाड़) के सलुम्बर ठिकाने के रावत चुण्डावत की रानी थी  | जिनकी शादी का गठ्जोडा खुलने से पहले ही उसके पति रावत चुण्डावत को मेवाड़ के महाराणा राज सिंह (1653-81) का औरंगजेब के खिलाफ मेवाड़ की रक्षार्थ युद्ध का फरमान मिला |

 

मेवाड़ रियासत में सलूंबर का ठीकाना प्रथम श्रेणी चुडावत सामंतों का रहा है। यह ठिकाना मांझल रात में ब्‍याहकर आई उस हाड़ा रानी के लिए याद किया जाता है जिसने छिन्‍नमस्‍ता होने से गुरेज नहीं किया। बरात लौटी और सुबह ही पति चुंडावत सरदार के पास युद्ध का बुलावा आ गया। वह प्रिया से मिलन का ख्‍वाब संजोये हुए था।

 

रानी ने यह भांप लिया। उसने कर्तव्‍य को शीर्ष प्राथमिकता देते हुए पति को रण में जाने को कह दिया। जंग जीतने घोड़े के पांव महल के बाहर पड़े... मगर रास्‍ते में ही चुंडावत सरदार ने अपने सेवक को बुलाया और कहा कि मालूम नहीं जीयें कि मरें, जाओ और हाड़ा रानी से कोई निशानी लेकर आओ। 

 

सेवक के निशानी मांगने पर रानी ने यह सोच कर कि कहीं उसके पति पत्नीमोह में युद्ध से विमुख न हो जाए या वीरता नही प्रदर्शित कर पाए इसी आशंका के चलते इस वीर रानी ने अपना शीश काट कर ही निशानी के तौर पर भेज दिया ताकि उसका पति अब उसका मोह त्याग निर्भय होकर अपनी मातृभूमि के लिए युद्ध कर सके |

 

सेवक ने बतौर निशानी सरदार को नव परिणिता का सिर सौंपा, और रावत चुण्डावत ने अपनी पत्नी का कटा शीश गले में लटका औरंगजेब की सेना के साथ भयंकर युद्ध किया | औरन्जेब की सेना खदेड़ी गयी | रावत ने गुटने पर बैठ कर अपना शीश कटा, क्योंकि उसे जीने की तम्मना नहीं रही | वीरता पूर्वक लड़ते हुए अपनी मातृभूमि के लिए शहीद हो गया |

 

इस घटना पर कवि “माधवजी दरक” की एक रचना जिसे यहाँ नृत्य नाटिका के रूप में पल्लवी रायसुराणा  प्रस्तुत करने जा रही हें, स्वरबद्ध किया हे सिद्धार्थ कश्यप ने | गीत को स्वर दिया हे, राजा हसन और जानकी पारेख मेहता ने |

 

हाडी राणी गीत के बोल

इतिहास प्रसिद्ध त्याग का यह अदभुत गीत हे | जिसका नाम हे ‘हाडी राणी’ |

सलुम्बर के राव चुंडा जब युद्ध में जाते हें तब उन्हें पत्नी की स्मृति आती हे और एक सेवक को राणी के पास भेजते हें, निशानी लेने हेतु | वीरांगना हाडी राणी आपने कर्तव्य पहचानते हुए .... अपना शीस काट कर सेवक को देती हे | वो सेवक निशानी लेकर जब चुंडा के पास पहुँचता हे, तो वह देख कर अचम्भित हो जाता हे | इस गीत के लेखक हैं कवि माधव दरक |

सुनिए मर्म-स्पर्शीय गीत-गाथा .... हाडी राणी ....!

 

 

राव सलुम्बर के चुंडा ने मांगी एक निशानी थी,

शीस काट कर भेजा जिसने, वह तो हाडी राणी थी |

जन-जावर की शीतल छांया, उन उजियाली रातों में,

पर पता नहीं लग पता कुछ भी, प्रेम भरी उन बातों में |

रण वासों में बैठे रहना, ये ही ह्रदय को भाता था,

बार बार कलियों पर भंवरा, आ आ कर मंडराता था |

विर्हंता को सह सकने की, विर्हंता को सह सकने की, क्षमता बला जनि थी |

राव सलुम्बर के चुंडा ने मांगी एक निशानी थी | |

 

प्रातः की स्वर्णिम बेला में, शेहनाई की मीठी तान,

पर मंदिर में घंटो की ध्वनिया, खोल रही थी सब के कान |

की आना जाना दरबानों का, छडीदार ओ भला दीवान,

सभी शुब्ध हो सोच रहे थे, क्या हो किसका भला निदान |

की राज-काज की परवाह किसको, राज-काज की परवाह किसको, दिखती राणी राणी थी |

राव सलुम्बर के चुंडा ने मांगी एक निशानी थी | |

 

दुश्मन ने की घोर गरजना, रण का आया परवाना,

कि चुण्डावत तो प्रेमलीन हे, किसको जाकर के कहना |

किस वीरी यह सोच रहे थे, चन्द्र सिंग चुंडा का हाल,

रण भूमि में राव ना जाये, फिर क्या होगा रण का हाल |

क्षत्रिय कुल की मर्यादा पर काली लीप पुतानी थी,

राव सलुम्बर के चुंडा ने मांगी एक निशानी थी | |

 

राणी ने जब हाल सुना तो, घोर गरजना कर बोली,

पीठ दिखाना रण भूमि में, कायरता हाडी बोली |

की रणवासे में बैठे रहना, रण भूमि मैं जाति हूँ,

क्षत्र धर्म की रक्षा करने, मैं लड़ने को जाति हूँ |

पति से बढ़कर मात्री भूमि हे, माँ की आन निभानी थी,

राव सलुम्बर के चुंडा ने मांगी एक निशानी थी | |

 

सिंग नाद कर उछल पड़ा, बोला रण में जाऊंगा,

प्रिये मुझे क्या कहती हो, मैं रण भूमि में जाऊंगा |

रग रग में हे खून खलकता, केसरिया बाना लादो,

रण चंडी को लाकर मेरी, भला मेरी कमर में लटका दो |

वीरों का त्योंहार मरण हे, वीरों का त्योंहार मरण हे, रजपूती यह वाणी थी,

राव सलुम्बर के चुंडा ने मांगी एक निशानी थी | |

 

चढ़ घोड़े पर चला वीर वो, मन में था उत्साह लिए,

पर बैठ झरोके देख रही थी, प्रियतम को विश्वास दिए |

की हथलेवे की मेहंदी भी तो, नहीं सूखने पाई थी,

नयी नवेली दुल्हन वो तो, कल ही व्याह कर आयी थी |

पुर्खावों की बात न जाये, उसको याद जुबानी थी,

राव सलुम्बर के चुंडा ने मांगी एक निशानी थी | 6 |

 

रण मत माथा बढ़ा जा रहा, राणी की स्मृति आयी,

की अपने सेवक से बोला, अन्तःपुर जाओ भाई |

जाकर राणी से तुम कहना, रानियों मेरी राणी,

चुण्डावत हे निरल युध में, मंगवाई हे सेनानी |

ले सेनानी आना जल्दी, जम के तंवर तो भानी थी,

राव सलुम्बर के चुंडा ने मांगी एक निशानी थी | |

 

सेवक पहुंचा अन्तःपुर में, बोला जाकर महारानी,

और चुण्डावतजी ने मंगवाई, भला आप से सेनानी |

की करो शीघ्रता दो सेनानी, रण भूमि में जाना हे,

राव प्रेम में पागल उनको, सेनानी संभलना हे |

सेवक की सुन कर के वाणी, राणी तो मर्दानी थी,

राव सलुम्बर के चुंडा ने मांगी एक निशानी थी | |

 

राणी के उदगार ह्रदय की, निकली मुख से थी जी वाणी,

एक निशानी तुम्हे सौंपती हे, अंतिम ये सेनानी |

की जाकर प्रिय से कहना सेवक, राणी ने भेजा उपहार,

देख देख कर लड़ते रहना, करो भला इसको स्वीकार |

रण चंडी से शीस काट कर, भेजी अमर निशानी थी,

शीस काट कर भेजा जिसने, वह तो हाडी राणी थी | |

 

गौर कीजिये ... प्रकृति की क्या स्तिथि थी ?

 

उड़ते पंची मूक हो गए, इन्द्रासन भी डोल गया,

और डोल गयी आ धरती सारी, गोल गगन भी डोल गया |

की लगा देखने सूरज छिप कर, प्रथम किरण शशि मुख पर डाल,

बला सुमन बरसाने आयी, अरे देवता वहां तत्काल |

की खड़ी लक्ष्मी दुर्गा मनो, खड़ी लक्ष्मी दुर्गा मनो, दिखती हाडी राणी थी,

राव सलुम्बर के चुंडा ने मांगी एक निशानी थी | १० |     

 

रक्त रंग सा वसन डांक कर, और सजा कर थाली में,

पवन वेग सा उड़ा जा रहा, चंदा की उजियाली में |

की मग में लुक कर मुख को देखा, देखा कालक बुद्ध सम्मान,

सजल नेत्रों से झलक रहा था, अदभुत चुण्डावत का त्याग |

लज्जित होकर शीस थमाया, वक्षथल भवानी थी,

राव सलुम्बर के चुंडा ने मांगी एक निशानी थी | ११ |

 

लेकर सेनानी को, सेवक रण भूमि में जब आया,

की लाया सेवक सेनानी, मन में जोश उभर आया |

माला बना मुंड की उसने, आपने गले सजाई थी,

राणी की अंतिम सेनानी, जब चुंडा ने पाई थी |

पत्नी के उस अमिट प्रेम की, रण में ज्योति जलाई थी,

राव सलुम्बर के चुंडा ने मांगी एक निशानी थी | १२ |

 

... उसका माथा कैसा था..?

नागिन से थे केश शीस पर, चन्द्र मुखी थी वह बाला,

और हिरनी सी आँखों में, जिसने स्नेह सीख का जहर डाला |

की अधरों की लाली पर मनो, भंवर गुन-गुन डोल रहे,

जहाँ अनेकों तारे गिन कर, लब की फाटक खोल रहे |

रण भूमि की थी रंग शोभा, चुंडा की संगिनी थी,

राव सलुम्बर के चुंडा ने मांगी एक निशानी थी | १३ |

 

अरे राणी तेरी अमर कीर्ति, धन्य-धन्य तेरा बलिदान,

तेरा त्याग अनूठा राणी, तू धरती का हे अभिमान |

याद करेंगे तुझे ह्रदय से, गायेंगे तेरे गुणगान,

नारी का गौरव चमकेगा, सुन कर हाडी राणी नाम |

देश जाति को रण युद्ध में, माँ धन्य धन्य तेरा बलिदान,

शीस काट कर भेजा जिसने, वह तो हाडी राणी नाम,

वह तो हाडी राणी नाम....|

~ कवि माधव दरक 

Author Cdr Pratap Singh Mehta is a published author, behavioral coach and Indian Navy veteran. His site is www.pratapmehta.com 

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