बृहदेश्वर - अनन्य, अतुल्य शिवमन्दिर

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Brihadesvara or BIG Temple Thanjavur
  • विश्व धरोहर एवं भारत का अतुलनीय बृहदेश्वर मंदिर, तमिलनाडु की पहचान है। तंजावुर का अलंकार, यह मंदिर मध्यकालीन भारत के भवन निर्माण का जिवंत उदाहरण है|

 

तंजावूर स्थित बृहदेश्वर मन्दिर भारतीय शिल्प, स्थापत्य एवं निर्माण कला का अद्भुत उदाहरणों में से एक है। यह मन्दिर भारत में बने सबसे ऊंचे प्राचीन मन्दिरों में से एक है साथ ही इसके गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग भी बहुत विशाल है। इस मन्दिर का निर्माण राज राजा चोल ने एक हजार साल पूर्व करवाया था। प्रथम दृष्टि में यह मन्दिर देखने वाले को आश्चर्यचकित कर देता है | भारत के विकसित प्राचीन स्थापत्य कला का जीवंत नमूना है |  

 

भारत के ज्यादातर मन्दिर जहां मूर्ति भंजन अपवित्र किये जाने से त्याज्य हो गये, वहीं बृहदेश्वर, इस कुकृत्य से अस्पृश्य रहाअपने निर्माण के बाद से आज तक यहाँ पूजा अर्चना आदि निरंतर जारी है।    

 

तंजावूर नगरी अनेक शासकों की साक्षी रही है। ईसा पूर्व में यहाँ पूर्ववर्ती चोलों का शासन था जिनके पतन के उपरान्त पल्लव, पण्डया, मुत्तैयारों के हाथ इसकी सत्ता रही। लगभग नवीं शती में फिर एक बार चोलों को अभ्युदय हुआ जो मध्यकालीन चोल कहलाये। चोलों ने एक बार फिर से अपने को स्थापित करना आरम्भ किया। 

 

मध्यकालीन चोलों के चरमोत्कर्ष के समय उनकी सत्ता दक्षिण के अलावा, गंग प्रदेश के कुछ भागों के अतिरिक्त श्रीलंका, पूर्वी एशिया तक फैल चुकी थी। चोलों के पराभव के बाद मदुरई, विजयनगर, नायकों मराठों ने यहां राज किया। भारत की स्वतंत्रता से लगभग 90 साल पूर्व यह क्षेत्र ब्रिटिश सरकार के अधीन भी रहा।

 

चोल वंश का योगदान 

चोल राजा केवल धर्म के प्रति आस्थावान थे बल्कि कला शिल्प के उन्नायक भी रहे। उन्होंने अपने काल में अनेकों मन्दिरों का निर्माण करवाया जो स्थापत्य शिल्प के दृष्टिकोण से अतुलनीय हैं। चोल राजा शिव के अनन्य उपासक थे इसलिये उनके काल में निर्मित ज्यादातर मन्दिर शिवजी को समर्पित हैं। 

 

मध्यवर्ती चोलों में राज राजा चोल एक शक्तिशाली राजा के रूप में उभरे। लोकमानस में बसी किंवदन्ती के अनुसार उनको स्वप्न में शिवजी ने एक मन्दिर बनाने को कहा। एक मत यह मानता है कि शिवभक्त राजा राजा चोल ने अपने शासन को शिव की असीम अनुकम्पा मानते हुये इसका निर्माण करवाया। इस मन्दिर की परिकल्पना, स्थापत्य तय होने के उपरान्त अन्ततः सन् 1003 में इस पर निर्माण आरम्भ करवा दिया गया जो छह साल से कम समय में उनके राज्य की 25वीं जयन्ती से पहले पूर्ण हो चुका था। 

 

राज राजा चोल के पुत्र राजेन्द्र चोल प्रथम (सन् 1014-1044) भी पिता की तरह पराक्रमी राजा सिद्ध हुये। उन्होंने भी अपने पिता का अनुसरण करते हुये सत्ता का विस्तार जारी रखा। उनका भी धर्म, कला संस्कृति के प्रति अनुराग कम था। उन्होंने अपने राज्य की नई राजधानी की स्थापना की जिसे उन्होंने गंग प्रदेश के विजित करने के उपलक्ष्य में गंगैकोण्डचोलपुरम नाम दिया। अपनी नई राजधानी में उन्होंने तंजावूर की भांति एक बृहदेश्वर मन्दिर का निर्माण करवाया। 1143-1173 के मध्य रहे राज राजा चोल द्वितीय ने भी एक शिव मन्दिर का निर्माण करवाया। यह मन्दिर कुम्भकोनम के समीप दारासुरम में ऐरावतेश्वर नाम से जाना जाता है। 

 

अतुल्य शिवमन्दिर 

तंजावूर स्थित यह मन्दिर चोल साम्राज्य का एक अनमोल विरासत है। विशाल होने के कारण ही इसेबड़ा मन्दिर’ या बृहदेश्वर नाम मिला। इसके दूसरे प्रचलित नाम पेरुवुदईयार कोविल राजराजेश्वर हैं। 

 

राजराजेश्वरन, इसके वास्तुकार थे जिनके नाम से भी इस मन्दिर को जाना जाता है।    

 

बृहदेश्वर मन्दिर की भव्यता, विशालता स्थापत्य शैली से चोलों की कलापरकता, सम्पन्नता एवं संकल्प शक्ति का अनुमान लगाया जा सकता है। एक हजार वर्ष पूर्व जब परिवहन के साधन थे और आधुनिक मशीनें थीं, तब ऐसे में भारी भरकम पत्थरों को निर्माण स्थल तक ला कर कैसे मन्दिर का निर्माण हुआ होगा इसकी मात्र कल्पना ही की जा सकती है

 

यह मन्दिर द्रविड़ शैली के उन्नत अभियान्त्रिकी विकास, मूर्तिकला चित्रकला की विलक्षणता का भी अनुकरणीय उदाहरण है जो दक्षिण में बने दूसरे मन्दिरों से थोड़ा भिन्न है। द्रविड़ शैली में ज्यादातर मन्दिरों में जहाँ गोपुरम मुख्य मन्दिर की अपेक्षा काफी ऊँचे मिलते हैं वहीं बृहदीश्वर में गोपुरम अपेक्षाकृत छोटे हैं। इस मन्दिर में प्रवेश के दो गोपुरम है। इनमें केरलान्तक गोपुरम या बाह्य गोपुरम राजराजा चोल के द्वारा चेरा राजाओं पर जीत के बाद बनाया। जबकि दूसरा गोपुरम राजा राजा तिरुवसल है। तंजावूर में चोलों के बाद रहे शासकों ने भी वृहदीश्वर मन्दिर की कीर्ति को बढ़ाने अपना योगदान दिया। 13वी शती के उपरान्त रहे नायकों ने मन्दिर के बाहर किलेनुमा बाहरी दीवार बना कर इस मन्दिर को बाहर से अभेद्य बनाया मन्दिर प्रांगण में एक मण्डप बना कर उस पर एक विशाल नन्दी को स्थापित किया सुब्रह्मणम मन्दिर का भी निर्माण करवाया। मराठों ने केरलान्तक गोपुरम के बाहर मराठा द्वार निर्मित करवाया।    

Nandi Mandapa at Brihadesvara Mandir

 

मन्दिर की विविधता 

बृहदेश्वर शिखर शैली का देश का सबसे ऊंचा प्राचीन मन्दिर है। मन्दिर 120 मीटर चौड़ा और  240 मीटर लम्बा आयाताकार भूमि पर निर्मित है। बनावट में भी यह दूसरे मन्दिरों से अलग है। मन्दिर के विमान की ज्यामितीय संरचना गोलाकार होकर पिरामिड आकार की है जिसे शीर्ष पर 81 टन वजनी गोला या कुम्भम है। सबसे ऊपर कलश है। जमीन से लेकर शिखर तक की कुल ऊँचाई 60.96 मीटर है। मन्दिर का गर्भगृह वर्गाकार है मुख्य मन्दिर संरचना अधिक भार को सह सके इसलिये मन्दिर के गर्भगृह में दोहरी दीवारें है। गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। गर्भगृह ऊपर मन्दिर के विमान का अन्तरंग भाग खोखला है। मन्दिर में पत्थरों को जोड़ने के लिये पत्थरों में गेंद खांचे बना कर उनको बैठाया गया। मन्दिर की बाहरी दीवार पर अलंकरण शानदार है। मन्दिर के दोनों ओर बने मण्डपों में अनेकानेक शिवलिंग हैं। 

 

मुख्य मन्दिर के अलावा मन्दिर परिसर में स्थापित दूसरी अन्य स्थल भी हैं जैसे नन्दी मण्डप, मन्दिर बायीं दायी ओर परिक्रमा पथ के मण्डपों, मन्दिर परिसर में बने चण्डिकेश्वर, अम्मान, सुब्रह्मण्यम, गणेश मन्दिर आदि भी शिल्प की दृष्टि से उत्कृष्ट हैं। मन्दिर में आठों दिशाओं के स्वामी अष्ठ दिक्पालकों इन्द्र, वरूण, यम, कुबेर, वायु, निरुति, अग्नि और ईशान की छह फीट की प्रतिमायें हैं मन्दिर में प्रवेश करने के लिये मण्डप से सीढ़ियां हैं  

 

मण्डप के आगे गर्भगृह है जहां एक विशाल शिवलिंग स्थापित हैं। मुख्य मन्दिर के समक्ष चबूतरे पर बने एक मण्डप में अधिकार नन्दी की एकल प्रस्तर से बनी प्रतिमा भारत में दूसरी सबसे विशाल नन्दी की प्रतिमा है जो 6 मीटर लम्बी, 3.7 मीटर ऊँची 2.6 मीटर चौड़ी है।

 

मन्दिर सवा लाख टन ग्रेनाइट पत्थर से बना है ग्रेनाइट उपलब्ध पत्थरों में सबसे कठोर होता है। निर्माण के एक स्तर के पूर्ण होने पर संरचना के चारों ओर मिट्टी भर आगे का कार्य होता था एवं यह क्रम निर्माण की पूर्णता तक चलता था और अन्त में मिट्टी हटा दी जाती थी। ऐसा माना जाता है मन्दिर में स्थापित पत्थरों में सजावट मन्दिर में पत्थरों को जोड़ने के बाद ऊपर से नीचे की ओर की गई। बृहदेश्वर मन्दिर कई शासकों के अधीन रहा जिन्होंने इसके विस्तार में अपना योगदान दिया इसलिये इस पर अलग अलग शासकों के शिलालेख उत्कीर्ण मिलते हैं। इसकी एक अन्य विशेषता यह है कि इसके शीर्ष की छाया जमीन पर नहीं पड़ती है।  

 

विशालतम शिवलिंग 

बृहदेश्वर, उन कुछ मंदिरों में से है, जहां पर एक सहस्त्राब्दि से पूजा निरंतर हो रही है। इस मन्दिर के गर्भगृह में एक विशाल शिवलिंग स्थापित है जिसका इतना भव्य रूप देश के किसी दूसरे मन्दिर में देखने को नहीं मिलता है। यह शिवलिंग 3.66 मीटर ऊँचा है। सुबह मन्दिर में शिवलिंग के श्रृंगार के बाद ही मन्दिर दर्शन के लिये खुलता हैं। प्रातःकालीन दर्शन से पहले श्रृंगार होता है जिसमें काफी समय लगता है। श्रृंगार के बाद प्रथम दर्शन के लिये बड़ी संख्या में लोग यहां आते है। 

 

विश्वविरासत स्थल 

1987 में बृहदेश्वर मन्दिर को यूनेस्को ने पहली बार विश्वविरासत का स्थान दिया। कालान्तर में 2004 में इसमें चोलों के द्वारा निर्मित दो अन्य अद्वितीय मन्दिरों को जोड़ा गया जिन्हें आज महान जीवंत चोल मन्दिरों कहा जाता है। इनमें गंगैकोण्डचोलपुरम का बृहदेश्वर मन्दिर दारासुरम में बना ऐरावतेश्वर मन्दिर हैं। गंगैकोण्डचोलपुरम का बृहदेश्वर मन्दिर तंजावूर के शिवमन्दिर से छोटा है पर कुछ भिन्न है।  

 

विश्वविरासत स्थल बनने के बाद इन मन्दिरों का पर्यटन महत्व बहुत बढा है जिससे यहां पर श्रद्धालुओं के अलावा देशी-विदेशी पर्यटक बड़ी संख्या में यहां आते हैं इस मन्दिर पर कई डाक टिकट निकल चुके हैं वहीं भारतीय मुद्रा पर भी मन्दिर के चित्र को स्थान दिया जा चुका है। 

 

13वीं शती के मध्य तक चोल साम्राज्य का पतन हो गया नायक इसके नये शासक बन कर उभरे। उन्होंने राजधानी को फिर से तंजावूर में स्थापित करने का काम किया। नायकों में अनेक मजबूत शासक भी रहे। तंजावूर में रघुनाथ नायक ने तंजावूर में महल बनवाया। विजय राघव अन्तिम नायक शासक थे। 1675 में नायकों की शक्ति के कमजोर होते ही पश्चिम के ताकतवर मराठों ने इस पर अधिपत्य कर लिया। मराठा शासक शाहजी ने नायकों द्वारा बनाये गये महल में सिंहासन कक्ष बनाया उसमें कई बदलाव किये। उन्होंने यहां पर सरायों धर्मशालाओं का भी निर्माण भी करवाया पाण्डुलिपियों का संग्रहण किया। उनके उत्तरवर्ती मराठा शासक सरफरोज़ी द्वितीय ने अपने पूर्वजों के अलावा तंजावूर के पूर्व शासकों के दस्तावेजों से लेकर धातु की मूर्तियों, प्रस्तर प्रतिमाओं का संग्रहालय निर्मित किया। अन्तिम मराठा शासकों के अन्तिम राजा शिवाजी का कोई पुरुष उत्तराधिकारी होने से 1855 में अंग्रेजों ने इसको हथिया कर इस पर अपना नियन्त्रण करने में सफलता मिली।  

Saraswati Mahal in Maratha Palace 

 

तंजावूर के अन्य दर्शनीय स्थान

तंजावूर में बृहदेश्वर मन्दिर के अतिरिक्त तंजावूर का महल, कला दीर्घा, सरस्वती महल पुस्तकालय, दरबार हाल संग्रहालय देखा जा सकता है। यहाँ का महल, नायक राजाओं ने बनाया जिसका मराठा शासकों ने विस्तार किया। महल के बाहर एक मन्दिरनुमा आकृति है जो बाहर से मन्दिर ही लगती है। जिसके अन्दर प्रवेश मार्ग कुछ कठिन है। इसके सबसे ऊपर की मंजिल से नगर का दूर-दूर का दृश्य देखा जा सकता है। यहां पर मराठा सैनिकों का आयुध भण्डार हुआ करता था। महल में कई सज्जित कमरे हैं जहां उस समय के राजाओं के उपयोग की वस्तुओं को रखा गया है। यहां बनी कला दीर्घा में कांसें, पत्थर की मूर्तियां दूसरी कलाकृतियां रखी गई हैं। समीप में निजी प्रयासों से चल रहा सरस्वती महल पुस्तकालय है जिसे मराठा राजा सरफरोजी प्रथम ने अपने निजी प्रयास से जोड़ा था। वहां पर कई मध्यकालीन कई बहुमूल्य पाण्डुलिपियां पुस्तकें प्रदर्शित है। शाही संग्रहालय दरबार हाल है जिसमें उनके अस्त्र शस्त्र, रथ, निजी समान को रखा गया है। यहां पर तमिल विश्वविद्यालय में संग्रहालय है। यहां पर बना शिवगंगा पार्क देख सकते हैं। तंजावूर अपनी रेशम साडियों, चांदं पीतल आदि का शिल्प के लिय प्रसिद्ध है।  

 

आस पास के स्थल 

यहां से 35 किमी दूर मन्दिर नगरी कुम्भकोनम है। इसी से लगे धरासुरम में ऐरावतेश्वर मन्दिर है। मूर्तिकला की दृष्टि से यह अदभुत है। तंजावूर से लगभग 60 किमी दूर गंगैकोण्डाचोलपुरम का बृहदेश्वर मन्दिर है। यहां का बृहदेश्वर मन्दिर तंजावूर से छोटा दूसरी शैली से बना है। तंजावूर से 13 किमी दूर अदभुत तिरुवयुरू में शिव मन्दिर है जहां प्रसिद्ध संत संगीतकार त्यागराज की समाधि है। जनवरी में यहां पर हर साल त्यागराज संगीत महोत्सव होता है। 

 

कैसे आयें 

तंजावूर तमिलनाडु राज्य का एक प्रमुख नगर जिला मुख्यालय है। चेन्नई से यहां तक अनेक रेल सेवायें उपलब्ध है। चेन्नई से तंजावूर तक रेल मार्ग की दूरी 320 किमी. है। विश्वविरासत स्थल होने के कारण नगर में अच्छे होटल भी है तो मध्यम प्रकार की सुविधायें भी है। नगर में आने जाने के लिये सिटी बस से लेकर टैक्सी थ्री ह्वीलर उपलब्ध है। पोम्पुहार दूसरे शो रूम से तंजावूर में बनने वाला कांसे चांदी का हस्तशिल्प हस्तकरघा खरीदा जा सकता है। पर्यटकों के लिये घूमने का सबसे बेहतर समय नवम्बर से मार्च के मध्य होता है।

 

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