प्रमुख ज्योर्तिलिंग: केदारनाथ

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Kedarnath Mandir

हिन्दू धर्म में शिव की महिमा अपार है। शिव सर्जक भी है तो संहारक भी हैं। उनके सैकड़ों नाम हैं। वे देवों के देव महादेव हैं तो उनको कैलाशपति और भोलेनाथ भी कहा जाता है। देश में व देश से बाहर शिव के अनेकों उपास्य स्थल है। इनमें सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर, भीमाशंकर, विश्वनाथ, त्रयम्बकेश्वर, बैजनाथ, नागेश्वर, घृष्णेश्वर, रामेश्वरम के अलावा केदारनाथ ज्योर्तिलिग माने गये हैं। जहां शिव ज्योतिपुंज के रूप में विराजमान हंै। 
इनमें तीन ओर से हिम शिखरों से घिरा केदारनाथ ग्यारहवां ज्योर्तिलिंग माना गया है। यह उत्तराखण्ड में मौजूद चार प्रमुख धामों गंगोत्री, यमुनोत्री, बदरीनाथ में भी एक है। इसे उत्तराखण्ड में स्थित पंच केदारों केदारनाथ, मध्यमहेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ व कल्पेश्वर में प्रथम केदार माना जाता है। केदारनाथ के समीप प्रमुख नदी के रूप में मंदाकिनी व सरस्वती का संगम है जो यहां से आगे रुद्रप्रयाग तक प्रवाहमान होकर गंगा की प्रमुख सहायक नदी अलकनन्दा में जा समाती है। 

हिमालय में मौजूद ज्योर्तिलिंग केदारनाथ जी महिमा सबसे अलग है इसलिये हर हिन्दू जीवन में केदारनाथ जी के एक बार दर्शन कर करने की अभिलाषा रखता है। मान्यता है कि केदार दर्शन से पापों का नाश होता है और जन्म-जन्म के फेर से मुक्ति मिलती है।

 
पौराणिक दृष्टान्त

केदारधाम का उल्लेख स्कन्द पुराण, शिवपुराण सहित दूसरे ग्रन्थों में मिलता है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार केदारनाथ से पहले बदरीनाथ ही शिव का ही वास स्थान था किन्तु विष्णु जी के द्वारा उसे अपने लिये मांग लेने वे उस स्थान से दूर  केदारेश्वर धाम में रहने लगे। केदारनाथ में शिवलिंग की बजाय एक त्रिकोणीय शिला की ही पूजा अर्चना होती है। एक मत यह है कि यह शिला यहां पर पहले से मौजूद थी। दूसरे मत के अनुसार इस शिला का अस्तित्व पाण्डवों के आगमन के बाद हुआ। 
महाभारत युद्ध में पाण्डव अपने ही बन्धु बान्धवों के रक्तपात से बहुत दुखी थे और उस पाप से मुक्ति के लिये भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे। पर शिवजी उनसे बेहद रुष्ट थे और उनसे मिलना नहीं चाहते थे। इसलिये पाण्डव जब उनसे मिलने काशी गए तो वे वहा से दूर उत्तराखण्ड के गुप्त वाराणसी यानि गुप्तकाशी में वास करने लगे। पाण्डवों को जब उनका पता चला तो वे यहां आये। इससे शिवजी केदारपुरी आ गये। इस पर पाण्डव भी यहां आ पहंुचे। शिव ने यह जान महिष का रूप धारण धर लिया और एक झुण्ड में शामिल हो गये। किन्तु भीम ने द्वारा उनको पहचानने पर पर शिव धरती में प्रवेश करने लगे। इस पर भीम ने अपनी शक्ति से उनको अन्दर जाने से रोक लिया जिससे उनकी पीठ वाला हिस्सा ही वहां बच रह गया। शिव उनके समर्पण भाव से प्रसन्न हुये उनको दर्शन दिये और पाण्डवों को पाप से मुक्त किया। इस मन्दिर का उल्लेख महाभारत में भी नहीं मिलता है। कुछ विद्वान स्कन्द पुराण के नागरखण्ड में वर्णित एक पौराणिक वृतान्त से जोड़ते हुये देवराज इन्द्र के आग्रह पर यहां वास करने की बात करते हैं। उनके अनुसार केदारनाथ में उनका विग्रह पहले से ही रहा था किन्तु पाण्डवों के आने के बाद उसका स्थान वर्तमान वाले स्थान पर हो गया। 

मन्दिर की शैली
केदारनाथ मन्दिर उत्तराखंड की धरती पर सबसे विशाल व भव्यतम शिव मंदिर है, जो पत्थरों को काट व जोड़ कर बनाया गया है। मन्दिर छत्र शिखर शैली के प्रसिद्ध मन्दिरों में से एक है जो उत्तराखण्ड के दूसरे मन्दिरों में देखने को मिलती है। कुछ इसे उत्तराखण्ड की कत्यूरी शैली से प्रभावित बताते हैं। 
मन्दिर लगभग 6 फुट ऊंची वेदिका पर बना है जिसकी ऊंचाई 66 फीट है। इसका प्रवेश द्वार पूर्व दिशा में है। प्रवेश द्वार के अन्दर मण्डप या जगमोहन है जिसके बाद इसका बाद गर्भगृह है जिसके के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। मंदिर के जगमोहन या मुख्य मण्डप में कुन्ती, द्रौपदी सहित पाँच पाण्डवों की मूर्तियाँ हैं। बाहर प्रांगण में उनका वाहन नन्दी विराजमान हैं। 
मन्दिर का निर्माण किसने किया इसका कोई प्रमाणिक उल्लेख नहीं मिलता है। केदारनाथ में शिवलिंग की बजाय एक त्रिकोणीय शिला की पूजा की जाती है जिसके ऊपर ही यह मन्दिर है। कहा जाता है पाण्डवों के पौत्र जनमेजय ने इसे निर्मित करवाया था। एक अन्य मत के अनुसार वर्तमान मन्दिर का निर्माण आदि गुरु शंकराचार्य ने किया था। आपदा से पहले उनकी समाधि मन्दिर के पीछे थी। चंूकि श्ंाकराचार्य के केदारनाथ के बाद कहीं और होने का उल्लेख नहीं मिलता है। सनातन धर्म की स्थापना के निकले शंकराचार्य ने ही उत्तर भारत में अपने शिष्यों को इनकी पूजा का दायित्व दिया था। आज भी दक्षिण भारतीय पुजारी ही यहां के कई मन्दिरों पूजा का दायित्व निभा रहे हैं।  
वहीं पुरातात्विक दृष्टिकोण के अनुसार यह मन्दिर आठवीं शती में अस्तित्व में आ चुका था। इसका विवरण हिमाचल प्रदेश के एक राजा के द्वारा आठवीं शती में लिखी गई प्रशस्तियों में मिलता है। पाल नरेश धर्मपाल द्वारा की गई केदार यात्रा का वर्णन है। दसवीं शती में केदार तीर्थ की दक्षिण में भी प्रसिद्धी थी जिसका वर्णन कुछ प्रशस्तियों में मिलता है। लेकिन पुरात्वविद वाई.एस. कठोच वर्तमान मन्दिर का निर्माण बारहवीं शती के मध्य में होना मानते हैं। 
आपदा के बाद केदारपुरी में नवनिर्माण जारी है। मन्दिर को पुराने वाले रूप में लाने के लिये आस-पास के भवनों को हटा दिया गया है जो दृश्य रेखा को बाधित करते थे। इससे अब यह मन्दिर अब दूर से दिखने लगा है। आस-पास में कई अन्य निर्माण किये जा रहे है। मन्दिर के पीछे आपदा के कारण नष्ट हुई आदि शंकराचार्य की समाधि को नये सिरे से निर्मित किया जा रहा है। सरस्वती नदी के किनारे पर स्नान घाट भी बनाया जा रहा है जो पहले यहां पर मौजूद नहीं था। इससे यह सवा सौ वाले पुराने केदारनाथ धाम की तरह दिखने लगा है। निर्माण में स्थानीय सामग्री का उपयोग किया जा रहा है।

 
शीतकालीन प्रवास ऊखीमठ   
शीतकाल के समय केदारनाथ जी का प्रवास वहां से 60 किमी दूर ऊखीमठ में होता है। यहां पर मौजूद मन्दिर में शिव की ओंकारेश्वर के रूप में निरन्तर पूजा होती है किन्तु केदारेश्वर में ग्रीष्मकालीन प्रवास के छह माह तक उनकी पूजा केदार रूप मे होती है। इसलिये जो श्रद्धालु जो शीतकाल में केदारनाथ जी के दर्शन करना चाहते हैं वे इन दिनों ऊखीमठ में दर्शन लाभ प्राप्त करते हैं।  
ऊखीमठ को यह नाम इसके पौराणिक आधार पर मिला है। स्कन्दपुराण में इस बारे में जो वर्णन मिलता है उसके अनुसार दैत्यराज बाणासुर की पुत्री ऊषा रात्रि स्वप्न में एक नवयुवक को देख उसका वरण कर लेती है। यह बात वह अपनी निकटतम सहेली चित्रलेखा को बता कर मनोभावों के आधार चित्र बनवाती है और वास्तविक जीवन में उसे ही जीवनसाथी बनाने की बात करती है जो श्रीकृष्ण का पौत्र अनिरुद्ध निकलता है। ऊषा द्वारा अपने पिता को यह बताने से वे क्रुद्ध हो उठते है। जब अनिरुद्ध को जब यह पता चलता है तो वह यहां चला आता है। इस पर बाणासुर उसे बन्दी बना देता है। द्वारिका में श्रीकृष्ण यह पता चलने पर कि अनिरुद्ध को बंदी बना दिया गया है मुक्त कराने यहां आते हैं। इस पर शिवभक्त बाणासुर और उनके बीच एक अनिर्णायक संग्राम छिड़ जाता है। इसका अन्त न होते देख चिंतित ऊषा शिव की तपस्या में लीन हो जाती है। अन्तः में शिव प्रकट होकर इस संग्राम को रुकवा कर दोनों पक्षों के बीच सुलह करा कर उनके मध्य विवाह का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इस प्रकार यह स्थान शिव की प्राकट्यस्थली बनता है। 
यह मन्दिर भी नागर शैली का है। मन्दिर में शिव के अलावा ऊषा, अनिरुद्ध और मान्धाता की मूर्तियां हैं। समीप मे भैरव मन्दिर है। मन्दिर परिसर में केदारनाथ के रावल का निवास व मन्दिर समिति का कार्यालय व दूसरे भवन हैं। मन्दिर के प्रवेश द्वार के जीर्णोद्धार के बाद इसमें नवीनपन आया है जबकि अन्दर परिसर का ज्यादातर हिस्सा प्राचीन ही है।

कपाट खुलने का समय 
कपाट खुलने का दिन व समय शिवरात्रि को ऊखीमठ में पण्डितों की मौजूदगी में तय होता है जो अप्रैल से मई माह के बीच खुल जाते है। कपाट खुलने से पहले ऊखीमठ में चहल-पहल बढ़ जाती है। डोली यात्रा के निकलने के प्रथम दिन भैरव पूजा होती है, उत्सव मूर्ति को निकाला जाता है। अगले दिन चंादी से निर्मित उत्सव मूर्ति यानि पंचमुखी शिव विग्रह को पूजा अर्चना के बाद परम्परानुसार डोली में रखा जाता है। इसके बाद यह डोली केदारनाथ के लिये पैदल रवाना होती है। इस समय सेना का बैंड वहां पर मौजूद होता है। सैकड़ों भक्तों को साथ डोली पहले पड़ाव फाटा में रुकती है। दूसरे दिन डोली का पड़ाव गौरीकुण्ड में होता है। तीसरे दिन यह गौरीकुण्ड से केदारनाथ पहंुचती है। इसके वहां पहुचने पर वहां मन्दिर के कपाट खोल दिये जाते हैं। 
मन्दिर के कपाट दीपावली के अगले दिन भैयादूज को प्रातः चार बजे बंद कर दिये जाते है। कपाटबन्द होने पर उत्सव मूर्ति इसी प्रकार वापिस ऊखीमठ लौटती है जहां अगले 6 माह तक शिव जी की ओंकारेश्वर के रूप में केदार बाबा की पूजा अर्चना होती है। 
शीतकाल में नवम्बर माह से यहां पर बर्फ गिरने लगती है। तब यहां का तापमान शून्य से 15 डिग्री नीचे चला जाता है और मन्दिर कई मीटर बर्फ के नीचे दब जाता है। अप्रैल तक यह काफी कुछ पिघल जाती है जिससे यात्रा हेतु स्थितियां बनने लगती हैं। कपाट खुलने का दिन तय होने पर कुछ दिन पहले बर्फ व ग्लेशियरों के बीच से जाने हेतु मार्ग बनाया जाता है व आधारभूत सुविधायें जुटाई जाती हैं। कपाट खुलने पर इस पूरे क्षेत्र में गहमा गहमी बढ़ने लगती है। 

केदारनाथ की स्थिति 
केदारधाम उच्च हिमालय क्षेत्र में लगभग 11750 फीट या 3583 मीटर की ऊंचाई पर बसा है। मन्दिर के पृष्ठ में 22 हजार फीट ऊंचा केदार पर्वत श्रृंग दूर से ही नजर आता है। 2013 से पूर्व केदारनाथ से 3 किमी की दूरी पर चोराबाड़ी ग्लेशियर व ताल था के ध्वस्त होने से आई जबरदस्त जलप्रलय में हजारों लोग मारे गये थे। अथाह जलराशि की राह में जो कुछ भी आया उसमें कुछ न बच सका। केदारपुरी में इस जलप्रलय से मन्दिर को छोड़ बाकी सब कुछ बह गया था या नष्ट हो गया था। मन्दिर के पीछे भीमशिला है जिसने आपदा के समय मलबे व पानी का रुख मन्दिर की ओर जाने से रोक दिया था जिससे मन्दिर को मामूली नुकसान हुआ। इस जलप्रलय ने केदारघाटी का भूगोल ही बदल डाला। गौरीकुण्ड से केदारनाथ मार्ग का आध भाग तो नष्ट हुआ ही बल्कि इसके मध्य में पड़ने वाले सबसे बडे पड़ाव रामबाड़ा का नामोनिशान ही मिटा दिया। यात्रा के आरम्भ स्थल गौरीकुण्ड में भी इससे काफी तबाही हुई। यहां के ज्यादतर होटल, पार्किग स्थल सहित तप्तकुण्ड जिसमें यात्री स्नान कर केदार की यात्रा पर जाते थे पूरी तरह से नष्ट हो गये। आपदा के बावजूद यहां पर गौरी का मन्दिर यथावत रहा। बाढ़ से केदारनाथ से लेकर ऋषिकेश के मध्य सड़कें, भवन, पुल आदि बह गये। आपदा से पैदल पथ की पहाडियों को अस्थिर कर दिया है। आपदा से परम्परागत पुराने पथ का 50 प्रतिशत भाग पूरी तरह से नष्ट हो गया। आपदा के बाद यात्रा हेतु नया पैदल पथ बनाया गया जिससे केदारनाथ की दूरी कुछ किमी. बढ़ गई है।  
2014
के बाद रास्तों की मरम्मत एवं केदारनाथ में सुविधाओं के जुटने के बाद और शनैः-शनै श्रद्धालुओं केे विश्वास बढ़ने से यह यात्रा पुरानी वाली स्थिति में आ चुकी है और अब पहले से कहीं अधिक यात्री यहां आ रहे हैं। 
   
निकटवर्ती स्थल
मन्दिर से कुछ ही दूरी पर खुले आसमान के नीचे भैरव मन्दिर है। इनको भुकुण्ड भैरव कहा जाता है। यह शिव के गण व यहां के क्षेत्रपाल है। जब 6 माह तक शिव अपने शीतकालीन प्रवास पर होते हैं उन दिनों वे मन्दिर की निगरानी करते है। जहां पर कई दूसरी मूर्तियां भी है। यहां से केदारपुरी का विहंगम दृश्य दिखता है। केदारनाथ से 6 किमी की दूर पर वासुकी ताल है। मन्दिर के पीछे श्ंाकराचार्य की समाधि है जिसे आपदा के समय बहुत नुकसान पहुंचा था। कहा जाता है कि श्ंाकराचार्य जी ने देश के चार कोनों में चार धामों की स्थापना के बाद यहां पर प्राण त्यागे थे उस समय उनकी आयु 32 वर्ष थी। उनकी नई समाधि को बनाया जा रहा है। केदारनाथ में रेतस कुण्ड, अमृत कुण्ड, इ्रशान कुण्ड हंस कुण्ड का महात्यम बताया गया है वे आपदा में नष्ट हो गये। यहां पर पांच गंगाओं मंदाकिनी, सरस्वती, महोदघिगंगा, स्वर्गद्वारी के यहां पर होने का वर्णन मिलता है वह आपदा के बाद विलुप्त हो चुकी हैं। बस सरस्वती और मदाकिनी की प्रवाहमान दिखती है। यहां से एक पैदल ट्रैक भी गंगोत्री को निकलता है। 

आस पास के अन्य प्रमुख दर्शनीय मन्दिर 
सोनप्रयाग से 5 किमी. दूर एक अलग मार्ग पर त्रियुगीनारायण हैं। यहां पर नारायण का एक मन्दिर है। इस स्थान पर शिव एवं पार्वती का विवाह हुआ माना गया है। मन्दिर परिसर में एक अग्निकुण्ड है। पुरातत्व विभाग के अनुसार इस मन्दिर में मौजूद ब्राह्मी में लिखा शिलालेख राज्य में कालसी के अशोक के शिलालेख के बाद दूसरा पुराना शिलालेख है। कुछ लोग यहां विवाह कराने भी आते हैं। 
सोनप्रयाग से 20 किमी दूर गुप्तकाशी की भी अपनी पौराणिक मान्यता है। इसका नाम गुप्तकाशी इसलिए हुआ कि भगवान शिव यहां पर कुछ समय तक गुप्तवास पर रहे। जहां पर मणिकर्णिका कुंड है। लोग इसी में स्नान करते हैं। इसमें दो जलधाराएँ बराबर गिरती रहती हैं जो गंगा और यमुना नाम से अभिहित हैं। कुंड के सामने विश्वनाथ का मंदिर है। इसके निकट ही अर्धनारीश्वर का मंदिर है। मान्यता है कि कालान्तर में काशी का महत्व घट जायेगा तब शिव यहीं पर भक्तजनों को दर्शन लाभ देंगे। यहां के पुजारी दक्षिण भारत से होते हैं। 
गुप्तकाशी से 8 किमी. की सड़क दूर कोटमा मार्ग पर प्रसिद्ध शक्ति मन्दिर कालीमठ है जहां पर महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती के मन्दिर हैं। कालीमठ एक समय तन्त्र साधना का केन्द्र था। यहां पर महाकाली यंत्र स्थापित है। नवरात्रों में यहां पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु मनौतियां मांगने को आते हैं। प्राचीन समय में जब सडत्रक मार्ग नहीं थे तो यह यात्रा पैदल ही तय होती थी।   
मन्दिर प्रात कालीन आरती के बाद दर्शनों के लिये खुलता है। दोपहर में मन्दिर कुछ समय के लिये बंद रहता है। सायं को 5 बजे से फिर दर्शनों के मन्दिर के कपाट खुलते हैं और रात्रि 8 बजे आरती के बाद पुनः कपाट सुबह तक के लिये बंद कर दिये जाते हैं।

कैसे आयें 
केदारनाथ का मुख्य प्रवेश द्वार ऋषिकेश है जहां से बदरीनाथ राजमार्ग पर 135 किमी. दूरी पर रुद्रप्रयाग है। यहीं से कुछ पहले एक मार्ग सोनप्रयाग को चला गया है जबकि दूसरा मार्ग चमोली हाते हुये बदरीनाथ को चला गया है। चार धाम यात्रा पर निकले यात्री उत्तरकाशी से घनसाली चिरबटिया होते हुये तिलवाड़ा में रुद्रपयाग गौरीकुण्ड राजमार्ग में मिलते हैं।    
सोनप्रयाग में सभी निजी व दूसरे वाहन रोक दिये जाते हैं जहां से गौरीकुण्ड की 5 किमी दूरी स्थानीय टैक्सियों से तय करनी होती है। गौरीकुण्ड मार्ग बेहद संकरा है व वहां पर आपदा के बाद पार्किग की सुविधा न होने से ऐसा किया जाता है। हल्द्वानी एवं रामनगर से कर्णप्रयाग आकर आगे का सफर वाया रुद्रप्रयाग होकर पूरा किया जा सकता है। वाया कोटद्वार भी एक यात्रा पथ है। कोटद्वार से भी यष्यात्रा की जा सकती है। यहां से गोरीकुण्ड की दूरी लगभग 260 किमी. पड़ती है। चार धामों में केदारधाम के बाद ंबद्रीनाथ यात्रा होती है। इसलिये ज्यादातर यात्री केदारनाथ के साथ बदरीनाथ की यात्रा भी पूरी करते हैं। बदरीनाथ दो मार्गों में से किसी एक मार्ग से जा सकते है। एक मार्ग ऊखीमठ चोपता होकर गोपेश्वर से होते हुये चमोली में मुख्य यात्रामार्ग से जा मिलता है जो बेहद खूबसूरत नजारों से परिपूर्ण है। दूसरा मार्ग वापिस रुद्रप्रयाग से कर्णप्रयाग नन्दप्रयाग चमोली होते हुये है। सभी जगहों पर यात्रियों के निवास की सुविधायें हैं किन्तु ज्यादा संख्या में यात्रियों के आने से हरिद्वार से आगे जाम जैसी असुविधा का भी सामना करना होता है। ऐसी चरम स्थिति कुछ ही दिन रहती है। यहं आने का सबसे बेहतरीन समय कपाट खुलने से 15 जून व उसके बाद सितम्बर से अक्टूबर के मध्य रहता है। बरसात में यात्रा थम जाती है।  

यात्रा के साधन
सड़क का सफर पूरा करने के बाद गौरीकुण्ड से यात्रा पैदल ही तय होती है। यह मार्ग कठिन है। जो लोग पैदल नहीं चल सकते हैं वे घोड़े खच्चर, पालकी/डंडी व कण्डी से जाते है। इनकी दरें सरकार द्वारा तय होती हैं। एक सामान्य व्यक्ति 16 किमी की यात्रा को तय करने में 6 से 8 घंटे का समय लेता है। घोडे से इसे तय करने में जाने में चार घण्टे तक लगते हैं। आपदा के बाद पुराने रास्ते का काफी हिस्सा बहने से नया रास्ता कुछ बढ़ गया है। इसके अलावा कुछ वर्षो से हैली सेवाओं के चलने अब यहां पहुचना और भी आसान हो गया है। जो गुप्तकाशी फाटा आदि स्थानों से चलती है जिसमें एक ओर जाने में 7 से 9 मिनट लगते हैं। 
सड़क मार्ग से आने पर फोटोमैट्रिक पंजीकरण करने पर ही आगे जाने की अनुमति है। यह केन्द्र कई स्थानों पर बने हैं। इसी प्रकार जाने वाले यात्रियों का मेडिकल चेक अप भी होता है किन्तु यदि सामान्य मन्दिर की यात्रा करना ठीक है। यात्री के अचानक गर्म मौसम से इस अत्यन्त शीत एवं विरल वायु वाले क्षेत्र की यात्रा करने से उच्च रक्त दबाब वालों पर जबरदस्त असर होता है। हृदय गति असामान्य होने पर यात्रा पैदल की बजाय दूसरे साधनों से की जा सकती है।  

उक्त लेख में मन्दिर खुलने के समय के बारे में मन्दिर के पण्डाओं से बातचीत के बाद  वह जानकारी लिखी गई है। लेख में यदि कोई अपूर्ण जानकारी है तो उसे बाद में ठीक किया जा सकता है। मेरा प्रयास यह रहा है कि ज्यादा से ज्यादा जानकारी इसमें दी जाये। हालांकि कुछ जानकारी तब भी छूट गई है।  

 Bhairav Mandir enroute to Kedarnath

 New look Rambara enroute. In 2013 disaster atleast 5,000 devotees died here

 Kalimath Mandir is 8 kms from Guptakashi. 

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