देवभूमि के पंचकेदार

Share to Facebook Share to Twitter Share to Google Plus Share to Google Plus Share to Google Plus Add to Favourites
L to R is Madhmaheswar, Tungnath, Rudranath, Kalpeshwar

  • हिन्दू धर्मग्रन्थों में वर्णित देवभूमि के गढ़वाल क्षेत्र को केदारखण्ड या केदारमण्डल नाम से भी जाना जाता है। इसका यह नाम यहाँ पर शिव के केदार रूप में विराजित होने से पड़ा है| जहां पंच केदार के साथ शिव के अनेकानेक मन्दिर है। इसी हिमालय को शिव का वास माना गया है। गढ़वाल के लोकश्रुति में पार्वती को पर्वत पुत्री माना जाता है।

 

यही वह क्षेत्र है जहां राजा भगीरथ ने अपने पुरखों को तारने के लिये गंगा की कठोर तपस्या की थी। अन्ततः गंगाजी ने स्वर्ग से पृथ्वी पर आना तय किया। पृथ्वी को गंगा के वेग के प्रहार से बचने के लिए किसी को उसे थामने की आव्यशकता थी| शिवजी के अलावा कोई नहीं जो ऐसा कर पाता, इसलिये भगीरथ ने शिवजी की तपस्या कर उनको मनाया और फिर शिवजी की जटाओं ने पृथ्वी पर गंगा के वेग को थामा। हिमालय रूपी इन्हीं शिव जटाओं से गंगाजी की अनेक धारायें निसृत होकर उसे प्रवाहमान बनाये रखती हैं। 

 

भगवान् शिव की इस भूमि में ज्योर्तिलिंग केदारनाथ तो है ही साथ में चार दूसरे केदार भी हैं। शिवजी के इन स्थानों का विस्तृत वर्णन एवं उनका माहात्म्य केदारखण्ड नामक पौराणिक ग्रन्थ में मिलता हैमान्यता है कि घोर कलियुग में जब मनुष्य पुण्यहीन होंगे तो पंच केदार के दर्शन से ही उन्हें सदगति मिलेगी और पापों का नाश होगा।  

 

पंचकेदारों में केदारनाथ प्रथम केदार हैं तो मध्यमहेश्वर द्वितीय केदार है, तुंगनाथ तृतीय केदार, रूद्रनाथ चतुर्थ केदार और कल्पेश्वर या कल्पनाथ पंचम केदार है जो उत्तराखण्ड के गढ़वाल क्षेत्र में स्थित हैं। केदार यात्रा इन पांचों केदार के दर्शनों के बाद ही पूर्ण मानी जाती है। केदारनाथ, मध्यमहेश्वर एवं रुद्रनाथ दर्शन के लिये लम्बी कठिन पैदल यात्रायें करनी होती हैं, परन्तु कल्पेश्वर और तुंगनाथ धाम की यात्रा अपेक्षाकृत सरल है जिनके लिये दो से पांच किमी. ही चलना होता है। प्रथम चार केदार उच्च हिमालय क्षेत्र में हैं जिनके कपाट साल में छह माह के लिए ही खुलते हैं। शीतकाल मैं केदारनाथ एवं मध्यमहेश्वर जी का प्रवास ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मन्दिर में होता है। तुंगनाथ जी का शीतकालीन प्रवास मक्कूमठ के तुंगेश्वर मन्दिर में एवं रूद्रनाथ जी, गोपेेश्वर के गोपीनाथ मन्दिर में विराजित रहते हैं| इन स्थानों पर इनकी पूजा आदि होती है। इनमें कल्पेश्वर ही ऐसा धाम है, जो कम ऊंचाई पर स्थित होने से वर्ष भर खुला रहता है। इन पंचकेदारों की यात्रा हर किसी को एक अलौकिक आनन्द असीम ऊर्जा से भर देती है।

पंचकेदार में शिव के नाना रूप

महाभारत युद्ध में स्वजनों गुरू द्रोणाचार्य की हत्या सेे पाण्डव बेहद दुखी थे। इस पाप से मुक्ति पाने के लिये वे शिवजी के दर्शन करना चाहते थे। पांडवों ने शिवजी को कई स्थानों पर ढूंढा | परन्तु शिवजी उनसे रुष्ट थे और पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे स्थान बदल कर प्रवास कर रहे थे। अंततः, वे छिपने के लिए गुप्तकाशी उसके बाद केदारनाथ पधारे, लेकिन पाण्डव जब वहां भी पहुंचे तो शिवजी ने महिष (भैंस) बन कर महिषों के एक झुण्ड में जा छिपे। परन्तु भीम ने उनको पहचान लिया, और शिवजी धरा में अंतर्ध्यान होने लगे। बलशाली भीम ने विलम्ब किये बिना उनके पीठ वाले हिस्से को पकड़ लिया, जिससे वहां पर उनकी पीठ वाला हिस्सा स्थिर हो गया। पांडवों की भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी ने उनको दर्शन और पापों से मुक्त किया। उस शिला पर आज केदारधाम स्थित है। 

उनके शरीर के शेष भाग जिन स्थानों पर स्थिर हुये वहां पर चार अन्य केदार स्थापित हैं। इनमें मध्यमहेश्वर में उनका नाभि वाला भाग, तुंगनाथ में कंधे वाला भाग, रूद्रनाथ में सिर वाला भाग कल्पेश्वर मैं उनकी जटायें स्थिर हुई। केदारेश्वर के जो पांच अंग माने गये हैं उनका वर्णन केदारखण्ड नामक पुस्तक के अध्याय-47 में इस प्रकार से मिलता है।   

ष्केदारं मध्यमं तुंगं तथा रुद्रालयं प्रियं।

कल्पं महादेवी सर्वपापं प्रणाशनम्।

कथितं ते महाभागे केदारेश्वर मण्डलम्।।ष्

केदारनाथ.

देवभूमि के प्रथम केदार - केदारनाथ धाम में शिवजी की पूजा एक त्रिकोणीय शिला के रूप में की जाती है। प्रमुख केदार एवं ज्योर्तिलिंग के रूप में प्रख्यात होने से ज्यादातर तीर्थयात्री, केदारनाथ के दर्शन करने के पश्च्यात बद्रीनाथ के लिए रवाना हो जाते हैं। 

To read Kedarnath Yatra in Hindi Madyamaheshar Mandir 

द्वितीय केदार- मध्यमहेश्वर 

मध्यमहेश्वर पंचकेदारों में द्वितीय केदार हैं जिन्हें अपभ्रंश रूप में स्थानीय लोगों द्वारा मदमहेश्वर कहा जाता है। मध्यमहेश्वर तीर्थ के बारे में केदारखण्ड के अध्याय-48 में लिखा गया है कि इस शिव क्षेत्र के दर्शन करने से मनुष्य के सारे पाप दूर होते हैं और यह यात्रा शिवभक्ति के लिये होती है

मध्यमहेश्वर महात्म्यं सोपाख्यानं मया तव।

सर्व पाप हरं पुण्यं कथितम् शिवभक्तिदम्।। 

मध्यमहेश्वर धाम रुद्रप्रयाग जिले में पड़ने वाले हिमालय क्षेत्र में चौखम्बा पर्वत के समक्ष एक मैदाननुमा ढलान पर स्थित है। यहां पर शिवजी के नाभि या मध्य भाग की पूजा होती है। इसलिये यह मध्यमहेश्वर नाम से जाना जाता है। मंदिर के गर्भ गृह में नाभी रुपी शिवलिंग स्थापित है। मन्दिर के बाहर एक मण्डप है| मन्दिर, छत्र शिखर शैली में बनी है जिसका शीर्ष काष्ठ से जबकि बाकी मन्दिर प्रस्तर निर्मित है|मन्दिर की यह शैली आमतौर पर उत्तराखण्ड के ज्यादातर मन्दिरों में देखने में आती है जिसमें आमलक के ऊपर काष्ठ से बनी छत होती है। इस मन्दिर की व्यवस्था बदरीकेदार मन्दिर समिति देखती है। मन्दिर में पूजा अर्चना के लिये यहां पर केदारनाथ के रावल द्वारा दक्षिण भारतीय पुजारी की व्यवस्था की जाती हैं। मन्दिर में पण्डे नहीं होते है। इस मन्दिर के पीछे दो अन्य छोटे मन्दिर हैं। मन्दिर के पीछे की तरफ वन क्षेत्र हैं। मन्दिर के डेढ़ किमी की ऊंचाई पर बूढ़ा मध्यमहेश्वर का छोटा मन्दिर है जिसकी स्थिति अत्यंत जीर्णशीर्ण हैं।  

यह धाम समुद्रतल से लगभग ११,774 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह शीतकाल में भारी बर्फ से ढक जाता है। मन्दिर के कपाट बंद खुलने की परम्परा अनादि काल से चली रही है। शीतकाल में मध्यमहेश्वर जी की चल मूर्ति डोली में शीतकालीन प्रवास पर ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मन्दिर में आती है। जहां पर वे प्रतिस्थापित होते हैं और अगले छै माह यानि कपाट खुलने तक यहीं पर केदारेश्वर के साथ उनकी भी पूजा होती है। मध्यमहेश्वर के कपाट मई में खुलते नवम्बर में बन्द होते हैं। 

मध्यमहेश्वर की यात्रा दो स्थान, उखीमठ एवं गुप्तकाशी, से की जा सकती है। ऊखीमठ से मध्यमहेश्वर की कुल दूरी 40 किमी के आस-पास है। यहां से 12 किमी दूर मनसूना नामक स्थान है जहां से कुछ आगे भी सड़क बन चुकी है। यहां से 20 किमी रास्ता पैदल तय करना होता है। गुप्तकाशी से होकर जाने के लिये कालीमठ आना होता जहां से मध्यमहेश्वर की पैदल दूरी 30 किमीण् है। कालीमठ से और ऊखीमठ वाले रास्ते उनियाना में मिलते हैं यहां से पांच किमी पर रांसी गांव है। इस गांव में राकेश्वरी देवी का दर्शनीय पाषाण मन्दिर हैं। चार किमी आगे गौंडार गांव से मन्दिर के लिये 5 किमी की कठिन चढ़ाई है। रास्ता जंगल से होकर गुजरता है। यहां से 3 किमी पर मैखमा चट्टी से मध्यमहेश्वर के दूर से दर्शन होने लगते हैं। यह स्थान चारो और पहर एवं वनो से घिरा हैं

यह यात्रा हिमशिखरों, जल प्रपातों, तालों मखमली बुग्यालों के मन्त्रमुग्ध करते दृश्यों से भरी हुई हैं| ये यात्रा अलौकिक आनन्द देने वाली है। केदारनाथ की चहल-पहल के मुकाबले यहां पर बेहद शान्ति रहती है। एक ओर जहाँ चैखम्बा शिखर दृष्टिगोचर होता है तो दूसरी ओर मध्यमहेश्वर घाटी के गांव, तो एक ओर तुंगनाथ की ओर विशाल पर्वत हैं तो दूसरी ओर केदारनाथ जी है जो यहां से 15 किमी की दूरी पर है। लेकिन यह मार्ग अनेक हिमनद (ग्लेशियरों) से होकर गुजरता है और बहुत कठिन है।

कुछ यात्री यहां से होते हुए रुद्रनाथ जाते हैं लेकिन यह रास्ता काफी कठिन है जिस पर गाइड के बगैर जाना ठीक नहीं है। इस मार्ग पर बीच में कई ग्लेशियर पड़ते हैं। यहां से एक रास्ता तुंगनाथ को भी जाता है। रास्ते में रुकने को चट्टियां है। विश्राम के लिये मन्दिर के समीप में सीमित व्यवस्था है। यहां पर बदरी केदार मन्दिर समिति का एक विश्राम गृह भी है। भोजन के लिये स्थानीय लोगों के छोटे होटल हैं। समीप में सरस्वती नदी प्रवाहित होती है। 

 

View from Madhyamaheshar

Route to Tungnath

तृतीय केदार तुंगनाथ

 

धार्मिक दृष्टि से तुंगनाथ एक पुण्य क्षेत्र है। इसके बारे में केदार खण्ड के अध्याय-49 में कहा गया है कि इसके एक बार दर्शन करने से मनुष्य पर्याण के बाद परम गति को प्राप्त करता है।

तुंग क्षेत्रस्य द्रष्टार एक वारेपि ये नराः।

मृताः क्वचित प्रदेपि प्राप्नुन्युः पराम गतिम्।।

तुंगनाथ, तृतीय केदार के रूप में जाना जाता है। यहां पर शिवजी की भुजा वाला शिवलिंग स्थापित है। इसे तुंगेश्वर महादेव भी कहा जाता है। मन्दिर में पांच केदारों के लिंग भी है। मन्दिर की शैली छत्र शिखर शैली है जो उत्तराखण्ड के ज्यादातर प्राचीन मन्दिरो में देखने को मिलती है। यह मन्दिर चन्द्रशिला पर्वत की तलहटी में समुद्रतल से १३२३० फीट की ऊंचाई पर बसा है। पर्वत श्रृंग पर होने से इसे तुंगनाथ कहा जाता है। यह समस्त केदारों में सर्वोच्च ऊंचाई पर स्थित है। मन्दिर में बिल्व पत्र जल चढ़ाने की परम्परा है। यहां निकट में आकाशगंगा नाम की धारा निकलती है जिसमें पिण्डदान आदि किया जाता है।

एक ओर चोपता के सघन जंगल है तो दूसरी तरफ दूर-दूर तक फैली मखमली घास के मैदान है। पांच  किमी चलने पर तुंगनाथ मन्दिर आता है। यहां से एक किमी दूर चढ़ाई पर चन्द्रशिला नामक पर्वत है यदि मौसम खूला हो तो यहां से चारों ओर की दृश्यावली को देखा जा सकता है। यह अनुभव भूलने वाला होता है। यहां से अनेक हिमशिखर एकदम करीब दिखते हैं। इसके दक्षिण में गढ़वाल हिमालय की निचली पहाडियां दिखती हैं। बरसात में जाने पर यहां पर कई जगहों पर फूल ही फूल नजर आते है। तुंगनाथ में अधिक ऊचाई पर उगने वाली वनस्पतियों का एक शोध केन्द्र है। तुंगनाथ शीतकालीन प्रवास में यहां से 12 किमी दूर मक्कू गांव के मक्कूमठ में बने तंगेश्वर मन्दिर में पूजित होते हैं। तुंगनाथ में  रुकने के लिए धर्मशालाये छोटे विश्रामगृह भी हैं किन्तु ज्यादातर यात्री सुबह चोपता से जाकर दोपहर तक वापस लौट आते हैं। लौटने में तीन घंण्टे तक लग जाते हैं।

चोपता में कई होटल हैं तो वहीं कुछ लोग यहां से कुछ दूरी पर दुगलभिटा के रिसोर्ट टेन्ट कॉलोनियों में रुकते हैं। कुछ यात्री पर्यटक चमोली- गोपेश्वर होते हुये भी चोपता तक आते हैं। चमोली से चोपता तक की दूरी लगभग 50 किमी है। चोपता से एक पगडण्डी अनुसूया देवी मन्दिर के लिये निकलता है जो कि अत्रि ऋषि की पत्नी थीं। इस मन्दिर की बहुत मान्यता है।

 

Tungnath Mandir ka Shikhar  
चतुर्थ केदार रुद्रनाथ

रूद्रनाथ जी चौथे केदार हैं। रुद्रनाथ या रुद्रमहालय के नाम व स्थापना को लेकर कई दन्तकथायें और आख्यान जुडे़ हैं। इनकी महिमा का वर्णन भी केदारखण्ड के अध्याय-52 में मिलता है। 

केदारेश इति ख्यातस्मिषु लोकेषु मुक्तिदः।

अधोमार्गेण देवशि मन्मुखं तु महालये।।   

प्रथम आख्यान के अनुसार केदारनाथ की स्थापना से सम्बद्ध है जिसके अनुसार शिवजी के पांच भाग पांच जगहों पर स्थित हुए, जिनमें रुद्रनाथ में चट्टान पर शिवजी का मुख़ार बिन्दु स्थापित हुआ। दूसरे आख्यान के अनुसार जब सती के विरह से व्याकुल शिव रौद्र रूप लिये सती के अधजले शरीर को लेकर कैलाश की ओर प्रस्थान कर रहे थे तो उनका क्रोध चरम पर था। उसे शान्त करने के लिये उन्होंने यहां पर विष्णु की आराधना की। शिवभक्त अन्धक दैत्य से मुक्ति दिलाने के लिये देवताओं ने भी यहां पर शिव की आराधना की थी। जहां ज्यादातर शिवमन्दिरों में शिवलिंग की पूजा की जाती है नेपाल के पशुपतिनाथ और रुद्रनाथ में उनके मुखार बिन्दु के दर्शन होते हैं।

रुद्रनाथ का शिव मन्दिर एक गुफा के अन्दर स्थित है जहां पर शिवजी एक चटटान पर रौद्र मुख के रूप में स्थिर है। मन्दिर के बाहर छोटा सा मण्डप बना है। इसके अलावा यहां पर गौरी शंकर एवं गणेश जी की मूर्तियां स्थापित है। कुछ दूरी पर क्षेत्रपाल वजीर की धातु मूर्ति हैं। यह मन्दिर जेष्ठ माह से कार्तिक माह के बीच खुला रहता है। इसके पश्चिम में स्वर्ग द्वारी जलधारा निकलती है। नीचे कुछ दूरी पर वैतरणी कुण्ड है। कुछ लेखक मुख्य मन्दिर के भूस्खलन के कारण धंसने की बात कहते हैं। उनके अनुसार यह मन्दिर गुफा के आगे मौजूद रहा होगा लेकिन भूस्खलन से यह नष्ट हो गया था। लेकिन समीप में जब मन्दिर बनाना जब संभव न हुआ तो शिव के विग्रह को गुफा में स्थापित कर दिया गया। नीचे काटे गये पत्थरों की बावड़ी है जिसे वैतरणी कहा जाता है।  

 

रूद्रनाथ जी का शीतकालीन प्रवास के यहां से 18 किमी दूर गोपेश्वर के गोपीनाथ मन्दिर में रहता हैं। यह एक भव्य मन्दिर है। कपाट खुलने व बंद होने पर उनकी चलमूर्ति या उत्सवमूर्ति डोली में गोपेश्वर मन्दिर से रूद्रनाथ के लिये निकलती है व बंद होने पर रूद्रनाथ से गोपेश्वर आती है।

 

रूद्रनाथ जाने के चार रास्ते हैं, किन्तु प्रमुख रास्ता गोपेश्वर से हो कर जाता है। गोपेश्वर से तीन किमी दूर सगर तक सड़क है जहां से रुद्रनाथ जी की पैदल यात्रा आरम्भ होती है। यह मार्ग घने जंगलों के बीच से होकर निकलता है। इससे आगे ज्यूंरागली है। रास्ता निर्जन व सुनसान है। यह खण्ड तय करने के बाद फिर से वन क्षेत्र आता है। पितृधार से दूर दूर तक के मनोरम दृश्य नजर आने लगते है। जिसके बाद मखमली घास के बुग्यालों का क्रम शुरू होता है और दूर दिखने वाली धवल हिमालयी चोटियां निकट लगने लगती हैं। यहां से आगे पनार है जहां से पण्डारसेरा तक विशाल चरागाह है। इससे कुछ दूर तोन खर्क हैं जहां से रुद्रनाथ का मन्दिर दिखने लगता है। यहां जाने के तीन अन्य मार्ग और है इनमें से एक मार्ग मण्डल से पांच  किमी दूर अनुसूया देवी से 17 किमी दूर है। एक मार्ग हेलंग भर्कीए बांसा होते हुये डुमक से हैं जो 33 किमी की पैदल दूरी पर है।    

मार्ग में बुग्याल व हिमशिखर यात्री को मन्त्रमुग्ध करते हैं जिससे थकान का पता नहीं चलता है। दूर व दुर्गम रास्ते से कम ही लोग यहां जाते है। जाने वालों में स्थानीय लोगों की संख्या अधिक होती है। रूद्रनाथ, उत्तराखण्ड के सीमान्त जिले चमोली में स्थित है जो समुद्रतल से लगभग 11600 फीट की ऊंचाई पर है। यहाँ रहने के लिये बहुत ही सामान्य व्यवस्थायें हैं। पांचों केदारों में यहां की यात्रा सबसे कठिन है। यहां पर रक्षाबन्धन के अवसर पर एक मेला लगता है।

Rudranathji ki IkatKalpeshwar     
पंचम केदार कल्पनाथ

पंच केदारों में पंचम केदार कल्पेश्वर है। इस धाम को कल्पनाथ धाम भी कहा जाता है। दारखण्ड नामक पुराण के 53वें अध्याय में भगवान शिव अपने इस आलय के बारे में बताते हैं |
श्रृणु देवि प्रवक्ष्यामि पंचमं वै ममालयम।
कल्पस्थल मिति ख्यातम् सर्वपाप प्रणाशनम्।।

यह केदार मात्र 6500 फीट की ऊंचाई पर बसा है। कल्पेश्वर या कल्पनाथ में शिवजी जटाओं के रूप में विराजित है। कल्पनाथ धाम की स्थापना को लेकर एक और प्रसंग भी है जिसके अनुसार एक बार देवराज इन्द्र एवं देवता दुर्वासा ऋषि के श्राप से श्रीहीन हो गये थे। इससे पार पाने के लिये इन्द्र ने कल्पेश्वर में बैठकर शिव एवं विष्णु की तपस्या की। वे प्रसन्न हुये और कल्पवृक्ष की प्राप्ति हुई जिससे फिर से इन्द्र को देवलोक के राजा बने और देवता श्रीयुक्त हो गये। इससे यह स्थान कल्पेश्वर कहलाये। एक अन्य मत के अनुसार कहा जाता है कि पाण्डव काल में यहां पर जटामौलेश्वर का मन्दिर था जो भूस्खलन से नष्ट हो गया। आज यह लिंग एक स्थान पर गुफा में स्थापित है। यह उर्गम नामक स्थान पर है। उर्मम में उग्र्व ऋषि ने तपस्या की थी। यह स्थान बेहद शान्त व रमणीक है और घने जंगलों से घिरा है। शिवलिंग के निकट से हैरण्यमति की धरा निकलती है जो कल्पगंगा कहलाती है।

 

यह तीर्थ चमोली जिले की निचली पर्वत श्रृंखलाओं में है और वर्ष भर खुला रहता है। उर्गम तक का सड़क मार्ग बदरीनाथ धाम के मुख्यमार्ग पर जोशीमठ से कुछ पहले हेलंग से निकलता है। यहां से आगे भकी है जहां से यह केदार मात्र दो किमी की पैदल दूरी पर है। इस क्षेत्र में दो मन्दिर बंशीनारायण व फ्यूंलानारायण ऐसे है जो साल में कुछ ही दिन खुलते हैं।

इन समस्त केदारों को एक समय की जगह अलग-अलग समय में तय किया जा सकता है। इनमें मध्यमहेश्वर एवं रुद्रनाथ जाने के लिये काफी दमखम चाहिये होता है। पहले बार जाने वालों गाइड कर जाये तो अच्छा रहता है। प्रकृति का आनन्द लेना हो तो टेन्ट आदि लेकर जा सकते हैं। यह यात्रायें ईश्वर की सत्ता का आभास दिलाती है।

To read a good travelogue on Panchkedar in English by five youngsters