कौन होता है ऋषि?

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ऋषि एक संस्कृत शब्द है और बहुधा प्रयुक्त किया जाता है। यह शब्द उन लोगों द्वारा भी प्रयुक्त किया जाता है जो संस्कृत जानते भी नहीं हैं क्योंकि लगभग सभी भारतीय भाषाओं में यह शब्द स्थान पाये हुए है। ऋषि शब्द का अर्थ होता है प्राज्ञ, तत्वज्ञ, दार्शनिक, तथापि यह आवश्यक है कि इस शब्द के उद्गम को समझ लिया जाए। यह संस्कृत का शब्द है, और संस्कृत एक शास्त्रीय व उच्च्प्रतिष्ठित भाषा है जैसे ग्रीक, लेटिन, फ़ारसी। और, अन्य शास्त्रीय भाषाओं की तरह ही, संस्कृत में भी अधिकांश शब्द किसी धातु या मूलाधार से लिया गए हैं।

 

‘ऋषि’ शब्द ऋष मूलाधार से लिया गया है जिसका अर्थ होता है प्रवाह, द्रुत प्रवाह, विसर्पण, द्रुत चलन, गमन, चलन, प्रयत्न, प्रघात, प्रहार या वध। इस ‘ऋषि’ शब्द के संदर्भ में गमन वाला भाव लिया जाना है। अनादि सूत्र के अनुसार मूल शब्द ऋष के बाद एक प्रत्यय जोड़ दिया गया है – ‘इदुपद्धत कित – किसी शब्द का उपांत अक्षर यदि इक अक्षर है तो कित प्रत्यय उसमें जोड़ दिया जाएगा’। प्रत्यय के और विलुप्त हो जाते हैं। ऋष शब्द ‘ऋषि’ बन जाता है जिसका अर्थ होता है वह व्यक्ति जिसने वह सब प्राप्त कर लिया जो प्राप्त करने योग्य है। किसी मंत्र का प्रयोग करते हुए एक ऋषि स्व का ज्ञान प्राप्त कर लेता है और वह किसी मंत्र का रचेता भी होता है। ऋषि सर्वत्र सत्य को देखता है और बारंबार जन्म-मरण  के देहांतरण वाले चक्र से, जिसे कि संसार कहते हैं, बाहर निकल जाता है। ‘ऋषि’ एक ऐसे व्यक्ति का भी द्योतक है जिसने ज्ञान के क्षेत्र में पांडित्य प्राप्त कर लिया है। ‘ऋषि’ शब्द का अर्थ किसी ग्रंथ का रचयिता भी होता है। किसी विषय में दक्ष व्यक्ति को भी ‘ऋषि’ कह दिया जाता है। यह शब्द एक ऐसे व्यक्ति का प्रतीक है जो केवल सत्य बोलता है। ‘ऋषि’ ऐसा व्यक्ति भी होता है जो श्राप देने की शक्ति से सम्पन्न होता है।

 

‘ऋषि’ शब्द ऐसे व्यक्ति का द्योतक है जो मंत्रदर्शी होता है। यद्यपि, सामान्यतः किसी मंत्र के दर्शन कर लेने का अर्थ होता है उस मंत्र के सार-तत्व का बोध हो जाना, किन्तु ऐसे ऋषि भी हुए हैं जिन्होंने मंत्रों को शरीरतः भी देखा है। ऋषि सात प्रकार के होते हैं: महर्षि, परमर्षि, देवर्षि, ब्रह्मर्षि, श्रुतर्षि, राजर्षि, और कंदऋषि । सात ऋषि ऐसे हैं जो एक समुदाय बना लेते हैं और जो इस समुदाय में सम्मिलित होते हैं वे प्रत्येक संवत्सर में परिवर्तित होते रहते हैं।

 

‘ऋषि’ शब्द वेदों को भी द्योतित करता है। इसका अर्थ प्रकाश की किरण भी हो सकता है। ऋष मूल शब्द में जाएं तो इसका अर्थ ऐसे व्यक्ति से भी हो सकता है जो सत्याचरण, तप और  ज्ञान-प्राप्ति की साधना कर रहा हो। जिस व्यक्ति में सत्यपूर्णता, ज्ञान, वेद और तप का समुच्चय हो उसे ऋषि कहा जा सकता है। जो सन्यासी जीवन जी रहा हो और आत्म-ज्ञान का जिज्ञासु हो, उसे भी ऋषि कहा जा सकता है। ‘ऋषि’ वह होता है जो परम की ओर गमन कर रहा हो।

 

वेदों में अनेक ऋषि स्त्रियों का उल्लेख किया गया है। ऋग्वेद  में पच्चीस से अधिक ऋषि स्त्रियों का उल्लेख है। इस प्रकार, ‘ऋषि’ का तात्पर्य अनेकों ऐसे ऋषियों से हो सकता है जिनकी चर्चा वेदों, पुराणों तथा अन्य ग्रन्थों में की गई है। किसी ऋषि की संतान जन्मजात स्वतः ऋषि नहीं बन जाती बल्कि तप-साधना के बाद ही बन सकती है। ऋषि सैंकड़ों या हजारों वर्षों तक जी सकते हैं। वे इच्छानुसार किसी भी लोक में रह सकते हैं। पिछले अनेक निष्ठापूर्ण आध्यात्मिक जन्मों के बाद ही ऋषि का अवतरण होता है।

 

लेखक : संपादक प्रबुद्ध भारतयह आलेख लेखक के अंग्रेजी आलेख का हिंदी अनुवाद है |

 

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यह लेख सर्वप्रथम प्रबुद्ध भारत के मई 2018 का अंक में प्रकाशित हुआ था। प्रबुद्ध भारत रामकृष्ण मिशन की एक मासिक पत्रिका है जिसे 1896 में स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित किया गया था। मैं अनेक वर्षों से प्रबुद्ध भारत पढ़ता आ रहा हूं और मैंने इसे प्रबोधकारी पाया है। इसका शुल्क एक वर्ष के लिए रु॰180/-, तीन वर्ष के लिए रु॰ 475/- और बीस वर्ष के लिए रु॰ 2100/- है। अधिक जानकारी के लिए

 

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